इस सूत्र में पर वैराग्य का लक्षण किया है।
वैराग्य दो प्रकार का है। एक अपर और दूसरा पर। 'अपर वैराग्य' सम्प्रज्ञात समाधि का उपाय है और 'पर वैराग्य' असम्प्रज्ञात समाधि का। यद्यपि ज्ञान और वैराग्य में कारण कार्य सम्बन्ध है अर्थात् ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है परन्तु इस सूत्र के व्यासभाष्य में ज्ञान को ही वैराग्य कह दिया गया है। इसमें कारण और कार्य का अभेद कथन समझना चाहिए। सूत्र में 'पर' शब्द का प्रयोग करने से यह ज्ञात होता है कि पूर्व सूत्र में पढ़े वैराग्य का नाम ' अपर वैराग्य' है। अपर वैराग्य से 'सम्प्रज्ञात समाधि' की प्राप्ति होती है। सम्प्रज्ञात समाधि का अभ्यास करते-करते उसकी उन्नत अवस्था आ जाती है। उसी का नाम 'धर्ममेघ समाधि' है। धर्ममेघ समाधि में पुरुषख्याति रहती है। इसी को 'सत्त्वपुरुषान्यताख्याति' भी कहते हैं। धर्ममेघ समाधि को प्राप्त योगी उसमें भी दोष देखता है। क्योंकि सत्त्वपुरुषान्यताख्याति सत्त्वगुण का धर्म है। सत्त्वगुण परिवर्तनशील और तमोगुण, रजोगुण से सम्बद्ध है। अतः वह देखता है कि मैं आत्मा अर्थात् जीवात्मा तीनों गुणों के विकारों से पृथक् हूँ। इस प्रकार दोष देखने से गुणमात्र से वैराग्य उत्पन्न होता है। परवैराग्य से 'असम्प्रज्ञात समाधि' सिद्ध होती है, उससे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
ईश्वर साक्षात्कार होने पर योगी यह अनुभव करता है कि "जो मुझे प्राप्त करना था वह प्राप्त हो गया है। अब प्राप्त करने योग्य कुछ शेष नहीं है"। इस प्रसङ्ग में यह जानना चाहिये कि ईश्वर एक पदार्थ है, उसमें समस्त दुःखों से रहित नित्य आनन्द विद्यमान है। उस आनन्द को प्राप्त करने पर योगी यह कहता है कि जिस दुःखरहित नित्य आनन्द को मैं प्राप्त करना चाहता था, वह मुझे प्राप्त हो गया है। ज्ञान के विषय में भी योगी यह अनुभव करता है कि जो जानना था, वह जान लिया है। अब जानना शेष नहीं रहा है।
जो लोग योगाभ्यास के द्वारा ईश्वर साक्षात्कार नहीं करते वे केवल सांसारिक धनसम्पत्ति के उपार्जन और विषयभोगों में तल्लीन रहते हैं। उनको यह स्थिति प्राप्त नहीं होती। जिससे वे अनुभव कर सकें, कि मुझे जो प्राप्त करना था वह प्राप्त हो गया है, और प्राप्तव्य कुछ शेष नहीं रहा है। इसी प्रकार ज्ञान के विषय में भी जानना चाहिए कि अनेक विषयों का विद्वान् होने पर भी व्यक्ति ईश्वरसाक्षात्कार किये बिना ऐसी सन्तुष्टि को प्राप्त नहीं कर सकता जिससे वह अनुभव कर सके, कि जो जानना था वह जान लिया है, अब जानना शेष नहीं रहा है। प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि मैं समस्त दुःखों से छूटकर दुःखरहित नित्य आनन्द को प्राप्त करूँ। इस आकांक्षा की पूर्ति का समाधान ईश्वरप्राप्ति ही है, अन्य नहीं॥१६॥