Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/15

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Sutra
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥१५॥

शब्दार्थ - (दृष्ट-आनुश्रविक-विषय-वितृष्णस्य) [वर्त्तमान जीवन में] अनुभव किये हुए और सुने हुए विषयों की तृष्णा से रहित योगी की (वशीकार-संज्ञा) मन इन्द्रियों पर पूर्ण वशीकरण की अनुभूति (वैराग्यम् ) [अपर] वैराग्य है।
सूत्रार्थ - वर्त्तमान जीवन में अनुभव किये हुए और सुने हुए विषयों की तृष्णा से रहित योगी की मन, इन्द्रियों पर पूर्ण वशीकरण की अनुभूति 'अपरवैराग्य' है।

Vyas Bhashya

स्त्रियोऽन्नपानमैश्वर्यमिति दृष्टविषयवितृष्णस्य, स्वर्गवैदेह्यप्रकृतिलयत्वप्राप्तावानुश्रविकविषये वितृष्णस्य दिव्यादिव्यविषयसंप्रयोगेऽपि चित्तस्य विषयदोषदर्शिनः प्रसंख्यानबलादनाभोगात्मिका हेयोपादेयशून्या वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥१५॥

व्या० भा० अ०-  स्त्री, अन्न, पान, ऐश्वर्यादि 'दृष्टविषय' हैं। स्वर्ग, विदेह बनने की इच्छा और प्रकृतिलयत्व आदि 'आनुश्रविकविषय' हैं। इन सबमें तृष्णा रहित तथा दिव्यादिव्य विषयों के साथ सम्बन्ध होने पर भी उनमें विषय दोषदर्शी चित्त की प्रसंख्यान के बल से जो अनाभोगात्मक हेयोपादेय से शून्य वशीकार अनुभूति अर्थात् मन-इन्द्रियों को वश में करने का अनुभव 'वैराग्य' कहलाता है।। १५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में वैराग्य का स्वरूप बतलाया गया है। प्रत्येक योग जिज्ञासु को वैराग्य का स्वरूप अच्छे प्रकार जान लेना चाहिये। क्योंकि समाधि-प्राप्ति का यह प्रमुख साधन है। इस वर्तमान जीवन में इन्द्रियों के द्वारा अनेक सांसारिक विषय प्रत्यक्ष रूप में देखे और भोगे जाते हैं, उनको दृष्टविषय कहते हैं।

 

भोगों को भोगने में दोष कुछ 

प्रथमदोष - भोगों के भोगने से विषयभोग की इच्छा न्यून नहीं होती अपितु पूर्व की अपेक्षा अधिक तीव्र हो जाती है, विषय सेवन से कोई लाभ नहीं होता है।

द्वितीय दोष - विषय सेवन से शरीर की शक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे शरीर के द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्यों को व्यक्ति नहीं कर सकता।

तृतीय दोष - शरीर में विविध रोग उत्पन्न होते हैं, जिनसे व्यक्ति सदा दुःखी रहता है। 

चतुर्थ दोष - सांसारिक सुख भोगने के लिए धन, सम्पत्ति आदि अनेक पदार्थों के उपार्जन में अति मूल्यवान समय लगाना पड़ता है और साधना के लिए पर्याप्त समय भी नहीं मिलत्ता।

पञ्चम दोष - सुख के साधनों को सुरक्षित रखने के लिए महान् परिश्रम करना पड़ता है। 

षष्ठ दोष - जब सुख के लिए किए उपार्जित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं तो अर्जनकर्त्ता को बहुत दुःख होता है।

सप्तम दोष - भोगों के भोगने से व्यक्ति उनमें इतना आसक्त हो जाता है कि उनमें दोष दिखने पर भी वह छोड़ना नहीं चाहता और यदि वह उनको छोड़ना चाहता है, तो भी उनका छूटना अति कठिन हो जाता।

अष्टम दोष - सांसारिक सुख प्राप्ति के लिए व्यक्ति अनेक प्राणियों की हिंसा करता है, जिस हिंसा का भयंकर दुःख-फल ईश्वर की ओर से उसे मिलता है।

जो शास्त्रों के द्वारा सुने जाते हैं, अभी जिनका प्रत्यक्ष नहीं किया है, उनको 'आनुश्रविक विषय' कहते हैं। अर्थात् अगले जन्म में उत्तम माता, पिता, साधन-सम्पन्न परिवार में जन्म लेना, इसी जन्म में योगाभ्यास से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ, जिनकी प्राप्ति से व्यक्ति को धन, सम्पत्ति और सम्मान प्राप्त होता है। जैसे दृष्ट पदार्थों में दोष दिखाई देते हैं वैसे ही सांसारिक सुख देने वाले आनुश्रविक पदार्थों में भी दोष दिखाई देते हैं। इसलिए इन दोनों प्रकार के सुख और सुख-साधनों में दोष देखने से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि हानिकारक पदार्थों से ही वैराग्य होना चाहिये। योगाभ्यास में साधक पदार्थों के ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है। शरीर को स्वस्थ एवं बलवान् बनाने में सहायक उत्तम खान-पान को छोड़कर निर्बल और अस्वस्थ शरीर बनाना वैराग्य नहीं है। क्योंकि शरीर धर्मार्थकाममोक्ष का साधन है। इसकी रक्षा करना, इसको दीर्घायु बनाना, स्वस्थ रखने के लिए अनुकूल पदार्थों का सेवन करना आवश्यक है। यदि व्यक्ति सांसारिक पदार्थों का उचित प्रयोग करता है तो वैराग्य में कोई बाधा नहीं आती। कभी-कभी व्यक्ति धन वा सम्मान प्राप्ति के लिए कुछ वस्तुओं का परित्याग कर देता है। उदाहरण हमने साधुवेश में एक व्यक्ति को देखा था। लोगों से ज्ञात हुआ कि वह गृहस्थ थे। कहा गया था कि वे धन वा सम्मान प्राप्त करने के लिए काषाय वस्त्र धारण करके प्रचार करते, पश्चात् परिवार में जाकर जीवन व्यतीत करते थे। ऐसा करने से वैराग्य की प्राप्ति नहीं होती। 

संसार में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने स्वयं ईश्वर साक्षात्कार किया और अन्यों को भी करवाने का प्रयास किया। उनके जीवन के विषय में सुनने से ज्ञात होता है कि वे महान् थे, उन्होंने स्वयं को कृतकृत्य बनाया और दूसरों को भी कृतकृत्य बनाने का प्रयास किया है। यह आनुश्रविक विषय है। क्योंकि उन महापुरुषों को व्यक्ति ने स्वयं नहीं देखा है। ईश्वरप्राप्ति हेतु निष्काम भावना से इन महान् पुरुषों के जीवन के सदृश अपने जीवन को बनाने के लिए प्रयत्न करना अवैराग्य नहीं है अर्थात् वैराग्य में बाधक नहीं है।

वैराग्य की प्राप्ति में विवेक एक प्रमुख साधन है, यह पूर्व लिखा गया है। इस सन्दर्भ में इसको ध्यान में रखना होगा कि विवेक और अभ्यास के द्वारा ही वैराग्य की रक्षा होती है॥१५॥

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