इस सूत्र में अभ्यास का लक्षण बतलाया है। योग के विषय में पढ़ने-पढ़ाने और सुनने - सुनाने के पश्चात् यदि उसका अभ्यास न किया जाय तो योगविद्या की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए अभ्यास के स्वरूप को जानकर उसको व्यवहार में लाना चाहिए। चित्त की एकाग्रता को सम्पादित करने के लिए स्वस्थ और बलवान् शरीर की अपेक्षा रहती है। शरीर को स्वस्थ और बलवान् बनाने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता होती है, उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं। -
१. न्याययुक्त साधनों से उपार्जित सात्त्विक, पौष्टिक भोजन।
२. शरीर के सामर्थ्यानुसार बुद्धिपूर्वक किया हुआ व्यायाम।
३. ब्रह्मचर्य का पालन, समुचित निद्रा आदि।
शरीर के सुदृढ़ होने पर योगाभ्यासी सुखपूर्वक लम्बेकाल तक चित्त को एकाग्र करने में सफल होता है। शारीरिक बल होने पर भी यदि बौद्धिक बल न हो तो साधना में कठिनाई होती है। योग के साधक विचारों को जानना, योग की सिद्धि के लिए उनका प्रयोग करना, जो बाधक विचार हैं उनको जानना और दूर करना, यह बौद्धिक बल से होता है, अन्यथा नहीं। चित्त की एकाग्रता के लिए यम-नियमादि आठ अङ्गों का अनुष्ठान आवश्यक है। योगाङ्गों के पालन से अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि विवेकख्याति पर्यन्त होती है। जैसे-जैसे अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि होती है वैसे-वैसे चित्त की एकाग्रता दृढ़ होती है। व्यवहार में यम-नियमों का पालन करना समाधि के लिए अनिवार्य है। जो साधक प्रातः-सायं लम्बेकाल तक एक आसन पर बैठकर कई घण्टे ध्यान का अभ्यास तो करता है परन्तु व्यवहार में मन-वचन-कर्म से यम-नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, ऐसे साधक को समाधि की प्राप्ति नहीं होती। यम नियमों के विरुद्ध आचरण के कुछ उदाहरण नीचे लिखे जाते हैं .
• मद्यमांसादि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करना।
• खेती, व्यापार, सेवा कार्य आदि में असत्य बोलना।
• चोरी करना, पदार्थों में मिलावट करना, कम तोलना।
• रिश्वत लेना, मिथ्या साक्षी देना।
• अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए दूसरों की हानि करना।
• प्रीति को छोड़ झगड़ा करना-करवाना।
• ईश्वर-धर्म को छोड़ धन सम्पत्ति को सर्वोपरि जानकर उसका उपार्जन करना।
• ब्रह्मचर्य के विरुद्ध आचरण करना।
उत्तम वेदादि शास्त्रों को छोड़ अश्लील पुस्तकों को पढ़ना-पढ़ाना, सत्सङ्ग छोड़कर सिनेमा, दूरदर्शनादि के माध्यम से अश्लील-चित्रों को देखना-दिखाना, अश्लील शब्दों वा गानों का सुनना-सुनाना, अश्लील नृत्यादि को देखना, सन्ध्या-यज्ञादि को छोड़कर शृंगार में रत रहना आदि।
साधनाकाल में रूप और शब्द से एकाग्रता में बाधा पड़ती है। यदि योगाभ्यासी यह जान जाय कि यह शरीर, इन्द्रियाँ, सूर्यचन्द्रादि सभी पदार्थ नाशवान् हैं और बौद्धिक स्तर पर सम्पूर्ण सृष्टि को प्रलय सदृश अवस्था में पहुँचा देवे तो समाधि शीघ्र प्राप्त होती है। व्यक्ति संसार में रहता हुआ स्वस्वामिसम्बन्ध अर्थात् 'मैं और मेरा' इस मान्यता को अत्यन्त दृढ़ बना लेता है। यह योग में बहुत बाधक है। यदि व्यक्ति संसार के समस्त पदार्थों को ईश्वर का मान लेता है और उनसे अपना स्वामित्व छोड़ देता है तो सरलता से चित्त की एकाग्रता हो जाती है।
एकाग्रता की सिद्धि के लिए श्रद्धा का होना आवश्यक है। श्रद्धा का अर्थ योगाभ्यास में तीव्र रुचि और पूर्ण विश्वास है। योग में जितनी अधिक रुचि होती है, एकाग्रता उतनी ही दृढ़ हो जाती है।
कुछ लोगों की मान्यता है कि चित्त को एकाग्र करने के लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए किन्तु उसको स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए, इससे वह स्वयं स्थिर हो जायगा। इस मान्यता में कोई वास्तविकता नहीं है, क्योंकि चित्त एक जड़ पदार्थ है। वह स्वयं कभी भी नहीं चल सकता। उसको चलाने वाला जीवात्मा ही है, जैसे कि गाड़ी एक जड़ पदार्थ है, उसको चलाने वाला एक चेतन व्यक्ति होता है। कोई कहे कि अपने लक्ष्य पर पहुँचने के लिए गाड़ी को नियन्त्रित नहीं करना चाहिए, स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए, वह स्वयं लक्ष्य तक पहुँच जायेगी। इसके अनुसार यदि गाड़ी को चलाने वाला उसको स्वतन्त्र छोड़ देवे और गाड़ी स्वयं चलती रहे तो गाड़ी और उसका चालक दुर्घटनाग्रस्त हो जायेंगे। इसी प्रकार साधक यदि चित्त को नियन्त्रण में न रखे और खुला छोड़ देवे तो अवश्य ही अनर्थ को प्राप्त हो जायेगा। इसलिए उनकी मान्यता ठीक नहीं है॥१३॥