Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/10

1/10
Sutra
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १.१० ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

अभावप्रत्ययालम्बनावृत्तिर्निद्रा॥१०॥

शब्दार्थ (अभाव-प्रत्यय-आलम्बना) जाग्रत और स्वप्न के ज्ञान के अभाव की प्रतीति का आश्रय लेने वाली (वृत्ति:) वृत्ति (निद्रा) निद्रा है।

सूत्रार्थ - जाग्रत और स्वप्न ज्ञान के अभाव की प्रतीति का आश्रय करने वाली वृत्ति निद्रा वृत्ति है। अथवा जाग्रत और स्वप्न ज्ञान के अभाव का जो कारण तमोगुण है, उसका आश्रय लेने वाली वृत्ति 'निद्रावृत्ति' कहलाती है।

Vyas Bhashya

सा च संप्रबोधे प्रत्यवमर्शात्प्रत्ययविशेषः। कथम्, सुखमहमस्वाप्सम् प्रसन्नं मे मनः प्रज्ञां मे विशारदीकरोति। दुःखमहमस्वाप्तं स्त्यानं मे मनो भ्रमत्यनवस्थितम्। गाढं मूढोऽहमस्वाप्सम् गुरुणि मे गात्राणि क्लान्तं मे चित्तम् अलसं मुषितमिव तिष्ठतीति। स खल्वयं प्रबुद्धस्य प्रत्यवमर्शो न स्यादसति प्रत्ययानुभवे। तदाश्रिताः स्मृतयश्च तद्विषया न स्युः। तस्मात्प्रत्ययविशेषो निद्रा। सा च समाधावितरप्रत्ययवन्निरोद्धव्येति॥१०॥

व्या० भा० अ० - (निद्रा से) जागने पर निद्रा सम्बन्धी स्मृति के आने से निद्रा भी एक प्रकार का विशेष ज्ञान (वृत्ति) है। कैसे ? मैं सुख से सोया, मेरा मन प्रसन्न, मेरी बुद्धि को निर्मल कर रहा है। मैं दु:खपूर्वक सोया, मेरा मन अकर्मण्य चञ्चल होकर घूम रहा है। मैं गाढ़निद्रा में मूढ़ावस्था में सोया। मेरे अङ्ग भारी हो रहे हैं। मेरा चित्त थका हुआ, अलसाया और खोया खोया सा है। जागे हुए मनुष्य का ऐसा स्मरण इस प्रकार के अनुभवात्मक ज्ञान के बिना नहीं होना चाहिए। उस अनुभव के आश्रित रहने वाली स्मृतियाँ भी उसके विषय में नहीं होनी चाहिए। इस कारण निद्रा एक विशेष प्रकार का ज्ञान अथवा वृत्ति है। वह (निद्रा) समाधि अवस्था में अन्य वृत्तियों के समान निरोध करने योग्य है॥१०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में निद्रा वृत्ति का स्वरूप बतलाया गया है।

जिसमें व्यक्ति बिना किसी बाधा के ज्ञानपूर्वक विविध कार्यों का सम्पादन करता है वह जाग्रतावस्था है। जिसमें कुछ-कुछ जागता है और कुछ-कुछ सोता है, जाग्रतावस्था में किए व्यवहारों से बने संस्कारों के आधार पर तथा वात-पित्त-कफ के प्रबल होने के कारण विविध दृश्यों को देखता है वह स्वप्नावस्था है। जिसमें जाग्रत और स्वप्नावस्था का व्यापार बन्द हो जाता है वह 'निद्रावस्था' है। उसका मुख्य कारण तमोगुण है। निद्रा के समय जब रजोगुण दबा रहता है और सत्त्वगुण का कुछ उभार होता है तब जागने पर व्यक्ति कहता है कि मैं सुखपूर्वक सोया। जब गाढ़-निद्रा में रजोगुण का उभार होता है और सत्त्वगुण दबा रहता है तब जागने पर कहता है कि मैं दु:खपूर्वक सोया। जब सत्त्व एवं रजोगुण दोनों ही दबे रहते हैं और तमोगुण ही प्रधान रहता है तब जागने पर व्यक्ति कहता हैं कि मैं मूढ़तापूर्वक सोया। इससे यह सिद्ध होता है कि सुषुप्तावस्था में भी जीवात्मा अनेक प्रकार के अनुभव करता है। यदि निद्रावस्था में अनुभूतियाँ न होती तो जागने पर ये विविध प्रकार की स्मृतियाँ भी न होती।

जिस शरीर के द्वारा धर्मार्थकाममोक्ष की सिद्धि होती है उसको स्वस्थ रखना आवश्यक है। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य ये शरीर को स्वस्थ बनाने के साधन हैं। अतः निद्रा शरीर को स्वस्थ रखने का एक आवश्यक साधन है। जिस प्रकार भोजन के बिना शरीर स्वस्थ, बलवान नहीं रह सकता इसी प्रकार निद्रा के बिना भी स्वस्थ, बलवान् नहीं रह सकता। इसलिए व्यवहार काल में उचित निद्रा लेना योग का साधक है, बाधक नहीं। किन्तु साधना के समय निद्रा को रोकना ही चाहिए। कुछ लोगों का यह विचार है कि जब तक साधक चौबीस घण्टे की नींद को न जीत ले तब तक समाधि सिद्ध नहीं होती। यह मान्यता योग में बाधक है, साधक नहीं।

साधना करते समय निद्रा बाधक होती है। उसका अवरोध करना अनिवार्य है। क्योंकि निद्रा की विद्यमानता में वृत्ति निरोध नहीं हो सकता। जब तक निद्रा के कारणों का परिज्ञान न हो और उनको दूर करने का प्रयत्न न किया जाय तब तक वह दूर नहीं हो सकती। अतः साधना के समय आने वाली निद्रा के कुछ कारणों का यहाँ पर उल्लेख किया जाता है। -

(१) रात्रि में निद्रा की पूर्ति न होना।

(२) पेट की शुद्धि न होना।

(३) शारीरिक परिश्रम अथवा व्यायाम अपने सामर्थ्य से अधिक करना वा व्यायाम को छोड़ देना।

(४) भोजन का प्रतिकूल होना, गरिष्ठ होना वा मात्रा में अधिक होना।

(५) मादक द्रव्यों का सेवन करना।

(६) शरीर में ज्वर आदि रोगों का होना।

(७) शरीर में निर्बलता का होना।

(८) आसन को ठीक प्रकार से न लगाना।

(९) उपासना से पूर्व शौच - स्नान न करना।

(१०) शीतकाल में वस्त्रों को आवश्यकता से अधिक धारण करना।

(११) अध्ययन आदि में मानसिक परिश्रम अधिक करना।

(१२) सन्ध्या वा जप वाक्यों के अर्थों को न जानना अथवा उन पर चिन्तन न करना।

(१३) प्राणायाम को उचित मात्रा में न करना।

(१४) ईश्वर के विषय में पर्याप्त ज्ञान, श्रद्धा, रुचि का न होना।

(१५) योगाभ्यास के लाभ को और उसके न करने से होने वाली हानियों को न समझना। 

(१६) आलसी व्यक्तियों का सङ्ग करना, इत्यादि॥१०॥

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