इस सूत्र में यह बतलाया है कि स्मृति व संस्कार की एकरूपता होने से जाति, देश, काल का व्यवधान होने पर भी वासनाओं में व्यवधान नहीं होता।
कर्मानुसार आत्मा मनुष्य, पशु आदि भिन्न-भिन्न जातियों में जन्म लेता है। कभी किसी देश में और कभी किसी देश में जन्म लेता है। किसी काल में किसी योनि में और किसी देश में जन्म लेता है। इस प्रकार से जाति, देश और काल परिवर्तित होते रहते हैं। भिन्न-भिन्न जातियों में, भिन्न-भिन्न देशों में और भिन्न-भिन्न कालों में जीवात्मा कर्मफलों को भोगता है। उन भोगों से संस्कार उत्पन्न होते हैं। कालान्तर में वे संस्कार स्मृति को उत्पन्न करते हैं। जैसे किसी जीवात्मा ने ऐसे कर्म किये कि उसको मनुष्य जन्म मिल गया। मनुष्य जन्म लेकर उसने ऐसे कर्म किये जिससे उसको पशु जन्म मिल गया। इसके पश्चात् पाप कर्मों का फल भोग लेने पर पाप-पुण्य समान हो जाने पर पुनः मनुष्य जन्म मिल गया। मध्य में पशु योनि आ जाने पर भी पूर्व मनुष्य योनि में भोगे हुए भोगों के संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। मध्य में जाति का व्यवधान होने पर भी वासनायें बाधित नहीं होती। इसी प्रकार से जीवात्मा का जन्म भिन्न-भिन्न देशों में होता रहता है। भिन्नभिन्न देशों में जन्म होने पर भी वासनायें बाधित नहीं होती। इसी प्रकार से लम्बे काल तक जीवात्मा अनेक योनियों में जन्म लेता है। परन्तु दीर्घकाल के पश्चात् भी उस उस योनि में भोगे हुए भोगों की वासनायें स्मृति को उत्पन्न करती हैं। इसलिये काल से भी वासनायें बाधित नहीं होती। इसका कारण, स्मृति और संस्कार की एकरूपता है। संस्कार से स्मृति और स्मृति से संस्कार उत्पन्न होते हैं। जैसे एक गौ का बछड़ा उत्पन्न होने के पश्चात् कुछ ही काल में गौ के स्तनों का दूध पीने के लिये प्रयत्न करता है और वह यह जानता है कि स्तनों में दूध मिलेगा। यह संस्कारों से स्मृति की उत्पत्ति है। यदि यह आत्मा पूर्वजन्म में मनुष्य-योनि में रहा हो और उससे पूर्वजन्म में गौ-योनि में रहा हो तो भी मनुष्य से पूर्व की गौ योनि के संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। उससे बछड़ा गौ के स्तनों से दूध पीने का प्रयास करता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जीवात्मा अनादि है।
लुछ संस्कार निर्बल होते हैं । वे कुछ काल के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं । जैसे किसी व्यक्ति ने एक साधारण फल बीस वर्ष पूर्व खाया हो तो प्रायः उस साधारण फल के खाने से जो संस्कार बना, वह थोड़े ही काल में नष्ट हो गया। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति किसी साधारण रूप को देखता है और वह साधारण का संस्कार अल्पकाल में ही समाप्त हो जाता है। इससे यह सिद्ध हुआ की जो प्रबल संस्कार हैं, वे दीर्घकाल तक रहते हैं और जो निर्बल संस्कार है, वे अल्प काल तक रहते हैं । दूसरे विरोधी संस्कारो से संस्कार अभिभूत हो जाते हैं, और समाप्त भी हो जाते हैं। व्यक्ति के प्रयास से भी संस्कार दब जाते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं।
इसलिए शुभ संस्कारों को प्रयत्न से दबा देना चाहिए और दीर्घकाल तक अभ्यास करके उनको नष्ट कर देना चाहिये। उत्तम संस्कारों को उत्त्पन्न करना चाहिये और उनको दीर्घकाल के अभ्यास से दृढ़ बनाना चाहिये। व्यक्ति अपने अशुभ संस्कारों को दबा सकता है और उनको नष्ट भी कर सकता है। इसी प्रकार शुभ संस्कारों को उत्पन्न भी कर सकता है और उनको दृढ़ भी बना सकता है। इसलिये यह नहीं मानना चाहिये कि हम अशुभ संस्कारों को रोक नहीं सकते अथवा नष्ट नहीं कर सकते॥९॥