इस सूत्र में कर्मफलानुरूप ही वासनाओं की अभिव्यक्ति बतलाई है।इससे पूर्व सूत्र में योगियों से भिन्न लोगों के तीन प्रकार के कर्म कहे हैं। शुभ, अशुभ और शुभाशुभ (मिश्रित)। पाप और पुण्य तुल्य होने पर अर्थात् पचास-पचास प्रतिशत होने पर साधारण मनुष्य जन्म मिलता है। पचास प्रतिशत से अधिक पुण्य और पचास प्रतिशत से कम पाप होने पर उच्च कोटि के माता पिता के सान्निध्य में मनुष्य का जन्म मिलता है। पचास प्रतिशत से अधिक पाप और पचास प्रतिशत से कम पुण्य होने पर पशु, पक्षी, कीट आदि का जन्म मिलता है। जब मनुष्य का जन्म मिलता है तब मनुष्य योनि में मिलने वाले फलानुसार ही वासनाएँ अभिव्यक्त होती हैं। पशु, पक्षी आदि योनियों में भोगे जाने वाले कर्मों के फलानुसार नहीं। जब पशु जन्म मिलता है तब पशु योनि में भोगे जाने वाले कर्मों के फलानुसार ही वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है। मनुष्य योनि में भोगे जाने वाले कर्मानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती।
जिस जीवात्मा ने पूर्वजन्म में मनुष्य शरीर में रहकर जैसे भोग भोगे थे वैसी ही वासनायें बनी थीं। यदि उसी जीवात्मा को अगला जन्म मनुष्य का मिल जाता है तो पूर्वजन्म में भोगे भोगानुसार अगले जन्म में भी वैसी ही वासनायें अभिव्यक्त होंगी। इसी प्रकार से पूर्वजन्म में जिस जीवात्मा ने पशु आदि योनि में रहकर जैसा फल भोगा है, यदि कर्मों के आधार पर उसे पशु योनि मिलती है तो पूर्वजन्म मे पशु योनि में रहकर जैसे भोग भोगे हैं, वैसी ही वासनायें अगले जन्म में भी अभिव्यक्त होती हैं। जिस-जिस योनि में जीवात्मा जन्म लेता है उस-उस योनि में भोगे कर्मफलों की वासनायें अभिव्यक्त होती हैं और उस योनि से भिन्न योनि की वासनायें दब जाती हैं। मनुष्य जन्म होने पर मनुष्य जन्म में भोगे फलानुसार वासनायें अभिव्यक्त होंगी, पशु योनि, पक्षी योनि में भोगे कर्म फलानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होगी। इसलिये तीन प्रकार के कर्मफलानुसार ही उस उस योनि में उस उस योनि के कर्मफलानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है और उससे भिन्न योनियों में भोगे कर्मफलों की वासनायें दब जाती हैं॥८॥