क्षणानन्तर्यात्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृह्यते क्रमः। न ह्यननुभूतक्रमक्षणा-नवस्य पुराणता वस्त्रस्यान्ते भवति। नित्येषु च क्रमो दृष्टः।
द्वी चेयं नित्यता- कूटस्थनित्यता परिणामिनित्यता च। तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य। परिणामिनित्यता गुणानाम्। यस्मिन्परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम्। उभयस्य च तत्त्वानभिघातान्नित्यत्वम्। तत्र गुणधर्मेषु बुद्ध्यादिषु परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमो लब्धपर्यवसानो, नित्येषु धर्मिषु गुणेष्वलब्धपर्यवसानः। कूटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्तपुरुषेषु स्वरूपास्तिता क्रमेणैवानुभूयत इति तत्राप्यलब्धपर्यवसानः शब्दपृष्ठेनास्तिक्रियामुपादाय कल्पित इति।
अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्तमानस्यास्ति क्रमसमाप्तिर्न वेति ? अवचनीयमेतत्। कथम् ? अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः - सर्वो जातो मरिष्यति इति ? ओम् भ इति।
अथ सर्वो मृत्वा जनिष्यत इति ? विभज्यवचनीयमेतत्। प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न जनिष्यत इतरस्तु जनिष्यते। तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसीत्येवं परिपृष्टे विभज्यवचनीयः प्रश्नः, पशूनधिकृत्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति। अयं त्ववचनीयः प्रश्नः - संसारोऽयमन्तवानथानन्त इति। कुशलस्यास्ति संसारक्रमपरिसमाप्तिर्नेतरस्येत्यन्यतरावधारणेऽदोषः। तस्माद्वयाकरणीय एवायं प्रश्न इति॥३३॥
व्या० भा० अ० - क्षण के पश्चात् उपस्थित होने वाला परिणाम की समाप्ति रूपी अवसान से गृहीत होता है (वह) 'क्रम' है। नये वस्त्र के अन्त में जो पुरानापन है, वह क्रम के आश्रित क्षणों का अनुभव किए बिना नहीं होता है। और नित्य पदार्थों में 'क्रम' देखा जाता है।
यह नित्यता दो प्रकार की होती है। (एक) कूटस्थ नित्यता और (दूसरी) परिणामी नित्यता। उन दोनों में से कूटस्थ नित्यता पुरुष की होती है, गुणों की परिणामी नित्यता होती है। जिसके परिणत होने पर (मूल) तत्त्व नष्ट नहीं होता, वह नित्य (पदार्थ) होता है। और स्वरूप के नष्ट न होने से (गुण एवं पुरुष) दोनों नित्य हैं। उन दोनों में से गुणों के धर्मभूत बुद्धयादि पदार्थों में परिणाम की समाप्ति से ज्ञायमान जो क्रम है उसका पर्यवसान लब्ध होता है (अर्थात् बुद्धयादि धर्मों में क्रम अवसान को प्राप्त होता है)। नित्यस्वरूप जो धर्मी गुण सत्त्वादि हैं, उनमें क्रम अवसान को प्राप्त नहीं होता है। कूटस्थ नित्य, स्वरूप में अवस्थित मुक्त पुरुषों में स्वरूप का अस्तित्व, क्रम के द्वारा अनुभूत होता है। इसलिए उनमें भी (क्रम का) पर्यवसान (समाप्ति) उपलब्ध नहीं होता है। ( वहाँ ऐसा क्रम) शब्द के आधार पर 'अस्ति' क्रिया को लेकर कल्पित किया गया है (वास्तव में क्रम नहीं है)।
इसके अनन्तर प्रश्न उपस्थित होता है कि सत्त्व आदि गुणों में, स्थिति एवं गति रूप से विद्यमान इस संसार की क्रम समाप्ति है वा नहीं ? यह (एक शब्द में) उत्तर देने योग्य (प्रश्न) नहीं है। कोई प्रश्न एक शब्द में उत्तर देने योग्य होता है, जैसे कि (क्या) जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी मरेगा ? (इसका उत्तर है) कि 'हाँ' (मरेगा)।
क्या प्रत्येक मृत प्राणी जन्मेगा ? (यह दूसरे प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर दो भागों में विभाग करके दिये जाने योग्य है कि - विवेकख्याति को प्राप्त, नष्ट हो चुकी तृष्णावाला, कुशल नहीं जन्मेगा, अन्य (प्राणी) तो जन्मेगा। उसी प्रकार मनुष्य जाति श्रेष्ठ है वा नहीं ? ऐसा पूछे जाने पर यह प्रश्न विभाग करके ही समाधान करने योग्य है। (जैसे कि) पशुओं की तुलना में श्रेष्ठ है, देवों एवं ऋषियों की तुलना में (श्रेष्ठ) नहीं है। यह संसार अन्त वाला है अथवा अनन्त ? यह प्रश्न भी (एक शब्द में) समाधान करने योग्य नहीं है। ( इसका उत्तर) कुशल (योगी) के संसार क्रम की समाप्ति होती है, (कुशल से) अन्य की नहीं होती है। (ऐकान्तिक रूप से) निश्चय करने पर दोष होगा। इसलिए यह प्रश्न विभागपूर्वक उत्तर देने योग्य ही है॥३३॥