इस सूत्र में यह कहा है कि धर्ममेघ समाधि के उदय होने पर सत्त्वादि गुणों के 'परिणामक्रम' की समाप्ति हो जाती है।
'धर्ममेघ समाधि' के उदय होने पर सत्त्व, रजस्, तमस् गुणों के 'परिणाम क्रम' की परिसमाप्ति हो जाती है। सृष्टि के आदि से लेकर तीन गुणों का क्रम ईश्वर की व्यवस्था से चलता रहता है। ईश्वर सत्त्वादि तीन गुणों से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार, उससे पाँच तन्मात्रायें, दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच भूतों की उत्पत्ति करता है। यह है गुणों का क्रम। जीवात्मा जब तक ईश्वर साक्षात्कार तक पहुँचकर मोक्ष का अधिकारी नहीं बनता, तब तक इन तीन गुणों के क्रम से छूट नहीं सकता। अर्थात् जन्म मरण के क्रम से बाहर नहीं जा सकता। योगी धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होने पर गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति के समीप आ जाता है। यहाँ पर आने से परवैराग्य और परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि, उससे ईश्वर साक्षात्कार होता है। इसके पश्चात् आत्मा मुक्ति का अधिकारी बनता है और फिर सत्त्व आदि गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति हो जाती है। यह बात पहले सप्रमाण लिख दी है कि धर्ममेघ समाधि में क्लेश सूक्ष्मरूप से रहते हैं, नितान्त समाप्त नहीं होते। धर्ममेघ समाधि, असम्प्रज्ञात समाधि नहीं है, यह भी पहले लिख दिया है॥३२॥