Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 32

4/32
Sutra
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमपरिसमाप्तिर् गुणानां ।। ४.३२ ।।

Bhashya

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Word Meaning

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्॥३२॥

शब्दार्थ - (ततः) धर्ममेघ समाधि के सिद्ध हो जाने पर (कृतार्थानाम्) भोग और अपवर्ग कार्य जिनका पूरा हो गया है उन (परिणामक्रम-समाप्तिः) परिणाम क्रम की समाप्ति हो जाती है (गुणानाम्) गुणों की।

सूत्रार्थ - धर्ममेघ समाधि के सिद्ध हो जाने पर भोग और अपवर्ग कार्य पूर्ण हो गये हैं जिनके, उन गुणों का ( महत्तत्त्व, अहंकार, मन, दोनों प्रकार की इन्द्रियाँ, तन्मात्रायें तथा पृथिवी आदि स्थूलभूतों को उत्पन्न करने का ) 'उत्पत्तिक्रम' समाप्त हो जाता है।

Vyas Bhashya

तस्य धर्ममेघस्योदयात्कृतार्थानां गुणानां परिणामक्रमः परिसमाप्यते। न हि कृतभोगापवर्गाः परिसमाप्तक्रमाः क्षणमप्यवस्थातुमुत्सहन्ते॥३२॥

व्या० भा० अ० उस धर्ममेघ समाधि के उदय से, (पुरुष को) भोगापवर्ग रूपी प्रयोजन को प्राप्त करा चुके गुणों के परिणाम का क्रम समाप्त हो जाता है। भोगापवर्ग को सम्पन्न कर चुके एवं समाप्त क्रम वाले (सत्त्व, रजस्, तमस् गुण) क्षण के लिये भी स्थित नहीं रह सकते॥३२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह कहा है कि धर्ममेघ समाधि के उदय होने पर सत्त्वादि गुणों के 'परिणामक्रम' की समाप्ति हो जाती है।

'धर्ममेघ समाधि' के उदय होने पर सत्त्व, रजस्, तमस् गुणों के 'परिणाम क्रम' की परिसमाप्ति हो जाती है। सृष्टि के आदि से लेकर तीन गुणों का क्रम ईश्वर की व्यवस्था से चलता रहता है। ईश्वर सत्त्वादि तीन गुणों से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार, उससे पाँच तन्मात्रायें, दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच भूतों की उत्पत्ति करता है। यह है गुणों का क्रम। जीवात्मा जब तक ईश्वर साक्षात्कार तक पहुँचकर मोक्ष का अधिकारी नहीं बनता, तब तक इन तीन गुणों के क्रम से छूट नहीं सकता। अर्थात् जन्म मरण के क्रम से बाहर नहीं जा सकता। योगी धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होने पर गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति के समीप आ जाता है। यहाँ पर आने से परवैराग्य और परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि, उससे ईश्वर साक्षात्कार होता है। इसके पश्चात् आत्मा मुक्ति का अधिकारी बनता है और फिर सत्त्व आदि गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति हो जाती है। यह बात पहले सप्रमाण लिख दी है कि धर्ममेघ समाधि में क्लेश सूक्ष्मरूप से रहते हैं, नितान्त समाप्त नहीं होते। धर्ममेघ समाधि, असम्प्रज्ञात समाधि नहीं है, यह भी पहले लिख दिया है॥३२॥

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