इस सूत्र में यह बतलाया है कि तब समस्त आवरण और मलों के दूर होने से ज्ञान की अधिकता के कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प रह जाता है।
अष्टाङ्ग योग के अनुष्ठान से, ईश्वर प्रणिधान से और मोक्षशास्त्रों के अध्ययन से अविद्या, अधर्म आदि मलों के दूर हो जाने से ज्ञान की अधिकता के कारण जानने योग्य पदार्थ अल्प रह जाता है, अर्थात् ईश्वर को जानने का कार्य थोड़ा ही शेष रहता है। ज्ञान की अनन्तता का यह अभिप्राय नहीं है कि जीव का ज्ञान ईश्वर की भाँति अनन्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान की मात्रा अधिक हो जाती है। उसके अधिक होने से आत्मा के लिये जो जानने योग्य पदार्थ हैं, वे अल्प रह जाते हैं। अर्थात् मोक्षप्राप्ति के लिये जितने पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है, उनमें से कुछ ही पदार्थ शेष रह जाते हैं ।
ज्ञान की अधिकता के अनेक कारण हैं। उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं –
(१) अविद्या के नाश से ज्ञान की वृद्धि होती है।
(२) कुसंस्कारों के नाश से ज्ञान की वृद्धि होती है।
(३) अधर्माचरण के त्याग से ज्ञान की वृद्धि होती है।
(४) मोक्षशास्त्रों के अध्ययन से ज्ञान की वृद्धि होती है।
(५) सत्त्वगुण की प्रधानता से ज्ञान की वृद्धि होती है।
(६) ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से ज्ञान की वृद्धि होती है।
यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए। जब योगाभ्यास आदि कारणों से योगी का ज्ञान प्रवृद्धि को प्राप्त होता है, तब योगी को अत्यन्त सावधान रहना पड़ता है। उस ज्ञान की अधिकता के कारण योगी के मन में अभिमान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है। यदि ऐसी स्थिति में योगी ईश्वरप्रणिधान को सतत बनाये रखता है तो अभिमान नहीं होता। अन्यथा अभिमान से बचना कठिन है। इसलिये योगाभ्यासियों को सदा ईश्वरप्रणिधान की स्थिति में रहने का सतत अभ्यास करते रहना चाहिये। इससे स्व-स्वामी सम्बन्ध उत्पन्न नहीं होता और स्वस्वामी सम्बन्ध के न होने से अभिमान भी उत्पन्न नहीं होता॥३१॥