Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 3

4/3
Sutra
निमित्तं अप्रयोजकं प्रकृतीनां. वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ।। ४.३ ।।

Bhashya

1 Available
Word Meaning

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥३॥

शब्दार्थ – (निमित्तम्) [धर्मादि] साधन (अ-प्रयोजकम्) प्रेरक नहीं है (प्रकृतीनाम्) शरीर के उपादान कारणों के (वरण-भेदः) प्रतिबन्धक का निवारण होता है (ततः) उस धर्मादि निमित्त से (क्षेत्रिकवत्) किसान के कार्य के समान।

सूत्रार्थ - धर्मादि निमित्त अर्थात् औषधि सेवन और योगाभ्यासादि शरीर के उपादान कारणों के प्रेरक नहीं होते किन्तु शरीर के विकास में बाधक कारणों के नाशक तो होते हैं, कृषक के समान। (अर्थात् जैसे किसान के द्वारा जल को अन्य स्थान पर ले जाने के लिए, बने हुये मेंड़ आदि बाधकों को तोड़ने पर, जल स्वतः ही दूसरी क्यारियों में प्रविष्ट हो जाता है, किसान उसे स्वयं हाथ से नहीं सींचता।)

Vyas Bhashya

न हि धर्मादिनिमित्तं तत्प्रयोजकं प्रकृतीनां भवति। न कार्येण कारणं प्रवर्तत इति। कथं तर्हि ? वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्। यथा क्षेत्रिकः केदारादपां पूर्णात्केदारान्तरं पिप्लावयिषुः समं निम्नं निम्नतरं वा नापः पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासां भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवापः केदारान्तरमाप्लावयन्ति, तथा धर्मः प्रकृतीनामावरणमधर्मं भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतयः स्वं स्वं विकारमाप्लावयन्ति। यथा वा स एव क्षेत्रिकस्तस्मिन्नेव केदारे न प्रभवत्यौदकान्भौमान्वा रसान्धान्यमूलान्यनुप्रवेशयितुम्। किं तर्हि ? मुद्गगवेधुकश्यामाकादींस्ततोऽपकर्षति। अपकृष्टेषु तेषु स्वयमेव रसा धान्यमूलान्यनुप्रविशन्ति, तथा धर्मो निवृत्तिमात्रे कारणमधर्मस्य शुद्धयशुद्धयोरत्यन्तविरोधात्। न तु प्रकृतिप्रवृत्तौ धर्मो हेतुर्भवतीति। अत्र नन्दीश्वरादय उदाहार्याः। विपर्ययेणाप्यधर्मो धर्मं बाधते। ततश्चाशुद्धिपरिणाम इति। तत्रापि नहुषाजगरादय उदाहार्याः॥३॥

व्या० भा० अ० - धर्म आदि निमित्त प्रकृतियों का प्रयोजक नहीं होता। कार्य के द्वारा कारण प्रवर्तित नहीं किया जाता। तो कैसे ? (प्रवर्तित होता है)। आवरण भेद तो उससे हट जाता है। क्षेत्रिक (किसान) के समान (उस (प्रकृत्यापूर) के द्वारा 'जात्यन्तर परिणाम' होता है)। जिस प्रकार क्षेत्रिक जल के भर जाने पर (एक) क्यारी से समान वा निम्न अथवा निम्नतर क्यारी में जल पहुँचाने की इच्छा वाला हाथ से नहीं सींचता किन्तु जल के आवरण (मेड़) को तोड़ देता है। उसके तोड़ने पर जल स्वयं ही दूसरी क्यारी में चला जाता है ( फैल जाता है)। उसी प्रकार धर्म प्रकृतियों के आवरण अधर्म को तोड़ देता है। उसके टूटने पर प्रकृतियाँ अपने-अपने विकार को प्राप्त हो जाती हैं। अथवा जिस प्रकार वही कृषक उसी क्यारी में जलीय वा पार्थिव रसों को धान के पौधों की जड़ों में पहुँचा नहीं सकता। तब क्या (होता है) ? मुद्ग, गवेधुक, श्यामाकादि (घास) को उस पौधे के पास से हटाता है। उनके हटाने से (पार्थिव तथा जलीय) रस धान की जड़ों में स्वयं ही प्रविष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार धर्म, अधर्म की केवल निवृत्ति में कारण है। शुद्धि और अशुद्धि का (परस्पर) अत्यन्त विरोध होने से। धर्म प्रकृति की प्रवृत्ति में कारण नहीं बनता है। इस (विषय) में नन्दीश्वर आदि उदाहरण के योग्य हैं। इसके विरुद्ध अधर्म भी धर्म को अभिभूत करता है। और उससे अशुद्धि परिणाम (होता है)। इस (विषय) में भी उदाहरण के योग्य नहुष व अजगर आदि (हैं)॥३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि जात्यन्तर परिणाम = अवस्थान्तर हो जाने में धर्माचरण शरीर की प्रकृति (उपादान कारण) को प्रेरित नहीं करता। किन्तु अधर्म (बाधक) को दूर करता है।

शरीर और इन्द्रियों में जो दोष उत्पन्न हो जाते हैं उन दोषों को धर्माचरण से दूर कर दिया जाता है। उनके दूर हो जाने पर शरीर का जो उपादान कारण पृथिवी आदि पाँच भूत हैं और भोजन आदि जिनसे शरीर का निर्माण होता है वे स्वयं शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। खेती करने वाला व्यक्ति जब अपने खेत में पानी देता है तो एक क्यारी के भरने के पश्चात् दूसरी क्यारी में अपने हाथ से पानी नहीं सींचता। किन्तु दो क्यारियों के मध्य में जो बाँध = मेड़ है उसको दूर कर देता है। उस बाधक के दूर होने पर पानी स्वयं दूसरी क्यारी में चला जाता है।

इसी प्रकार से दूसरा उदाहरण - खेती करने वाला व्यक्ति अपने खेत में से विविध प्रकार के घास, झाड़ आदि जो अन्न को बढ़ने, फूलने - फलने नहीं देते उनको निकाल देता है। इस स्थिति में जल एवं भूमि के रस धान के पौधों में स्वयं प्रवेश कर जाते हैं। इसी प्रकार योगी धर्माचरण से अधर्म को दूर कर देता है तो उसके शरीर के अन्दर उत्तम पदार्थों का समावेश हो जाता है। यदि योगी शरीर और इन्द्रियों के उपादान कारण पाँच स्थूल भूत और अस्मिता को लेकर नये शरीर और इन्द्रियों को स्वयं बना लेता तो यह खेत का उदाहरण देना व्यर्थ हो जाता। क्योंकि जैसे खेती करने वाला अपने खेत में से घास आदि को निकाल देता है, परन्तु खेत में धान के मूल में जल को व भूमि के रस को वह पकड़कर प्रवेश नहीं करा सकता। इसी प्रकार योगी शरीर के दोषों को दूर कर सकता है और शरीर को उत्तम बना सकता है। परन्तु मनुष्य के शरीर इन्द्रिय एवं मन से पशु आदि के शरीर, इन्द्रिय एवं मन को नहीं बना सकता इसलिये यही बात संगत प्रतीत होती है कि योगी उत्तम - साधनों से और अपने उत्तम-ज्ञान से शरीर और इन्द्रियों में विशेषता उत्पन्न कर देता है। नये शरीर और इन्द्रियों को नहीं बना सकता॥३॥

All Sutras