Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 28

4/28
Sutra
हानं एषां क्लेशवदुक्तं ।। ४.२८ ।।

Bhashya

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Word Meaning

हानमेषां क्लेशवदुक्तम्॥२८॥

शब्दार्थ - (हानम्) नाश (एषाम् ) इन [लौकिक संस्कारों] का [भी] (क्लेशवत्) क्लेशों के समान (उक्तम्) कहा गया है।

सूत्रार्थ - तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान तथा विवेकख्याति आदि उपायों से इन लौकिक संस्कारों का भी नाश क्लेशों के नाश के समान कहा गया है।

Vyas Bhashya

यथा क्लेशा दग्धबीजभावा न प्ररोहसमर्था भवन्ति, तथा ज्ञानाग्निना दग्धबीजभावः पूर्वसंस्कारो न प्रत्ययप्रसूर्भवति। ज्ञानसंस्कारास्तु चित्ताधिकारसमाप्तिमनुशेरत इति न चिन्त्यन्ते॥२८॥

व्या० भा० अ० - जिस प्रकार दग्धबीजभाव को प्राप्त हुए क्लेश उद्बुद्ध होने में असमर्थ हो जाते हैं उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि से दग्धबीज भाव को प्राप्त हुवे पूर्वसंस्कार, (लौकिक) ज्ञान को उत्पन्न करने में असमर्थ होते हैं। ज्ञानसंस्कार तो चित्त के भोगापवर्ग सम्पादन कार्य होने तक बने रहते हैं इसलिये उनके विनाश के लिए विचार नहीं किया जाता है॥२८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह कहा है कि इससे पूर्व सूत्र में कहे गये विषयभोगों के संस्कारों का नाश क्लेशों के नाश के समान कहा गया जानना चाहिये।

योगदर्शन के दूसरे पाद के प्रथम सूत्र में क्लेशों को तनु = निर्बल करने की विधि का कथन किया है। तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान से क्लेशों को तनु करना चाहिये। उन क्लेशों के तनु हो जाने के पश्चात् दूसरे पाद के १० वें, ११वें सूत्रों में उनके नाश की विधि बताई है। योग के आठ अङ्गों के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश और ज्ञान की प्रवृत्ति विवेकख्याति पर्यन्त होती है।विवेकख्याति के अभ्यास और ईश्वरप्रणिधान से क्लेशों को दग्धबीजभाव अवस्था में पहुँचाया जाता है। असम्प्रज्ञात समाधि के परिपक्व होने पर सत्त्वादि गुणों का अधिकार समाप्त हो जाता है। अर्थात् तीनों गुण भोगापवर्ग को सिद्ध करके निष्प्रयोजन हो जाते हैं। यह क्लेशों के नाश की विधि है। विवेकख्याति की अपरिपक्वावस्था में जो सांसारिक भोगों के भोगने से संस्कार

उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से विषयभोगों से सम्बद्ध अर्थात् विषयभोगों की ओर ले जाने वाले ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनका नाश भी क्लेशों के नाश की भाँति करना चाहिये।

अविद्या और अविद्या से जनित संस्कार दैनिक जीवन में उत्पन्न होते रहते हैं। अविद्या और उससे जनित संस्कारों को व्यक्ति उत्पन्न करता है। यदि व्यक्ति अविद्या और उससे उत्पन्न संस्कारों को जान लेता है तो विद्या और विद्या से जनित संस्कारों को उत्पन्न करके अविद्या का और उन संस्कारों का नाश कर देता है। जब अविद्या उभरती है तब योगाभ्यासी विद्या को उभारकर उस पर विद्या से आघात पहुँचा देता है। इस प्रकार अशुभ - संस्कारों पर शुभ - संस्कारों से आघात पहुँचाता है। जब हिंसा की प्रवृत्ति होती है तब अहिंसा के द्वारा उसको रोक देता है और अहिंसा को दृढ़ बनाने का अभ्यास करता है। इसी प्रकार करते-करते भोगों के संस्कार और उनसे उत्पन्न मिथ्याज्ञान का विनाश हो जाता है। इसके पश्चात् विवेकख्याति के संस्कार रहते हैं जो मोक्षप्राप्ति में कोई बाधा नहीं डालते। मोक्षप्राप्ति की अवस्था में वे संस्कार चित्त के साथ प्रकृति में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार से इन योगविरोधी ज्ञानों और संस्कारों का नाश करके मोक्ष का अधिकारी बनना चाहिये।

(इस सूत्र के भाष्य में क्लेशों और संस्कारों की दग्धबीजभाव अवस्था का जो वर्णन है, वह पूर्णतया दग्धबीजभाव अवस्था नहीं है अपितु उसके आसपास की स्थिति है क्योंकि यह स्तर सम्प्रज्ञात समाधि का है।)॥२८॥

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