Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 27

4/27
Sutra
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ।। ४.२७ ।।

Bhashya

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Word Meaning

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥२७॥

शब्दार्थ - (तत्-छिद्रेषु) विवेक-ज्ञान-प्रवाह के मध्य मध्य में टूटने पर (प्रत्यय-अन्तराणि) विवेक-ज्ञान से भिन्न सांसारिक ज्ञान [उत्पन्न होते हैं] (संस्कारेभ्यः) व्युत्थान संस्कारों से। 

सूत्रार्थ - विवेक-ज्ञान का प्रवाह, मध्य मध्य में टूट जाने पर व्युत्थान संस्कारों के कारण विवेक-ज्ञान से भिन्न सांसारिक-ज्ञान उत्पन्न होते हैं।

Vyas Bhashya

प्रत्ययविवेकनिम्नस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रप्रवाहिणश्चित्तस्य तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराण्यस्मीति वा ममेति वा जानामीति वा न जानामीति वा। कुतः ? श्रीयमाणबीजेभ्यः पूर्वसंस्कारेभ्य इति॥२७॥

व्या० भा० अ० - विवेक ज्ञान का अनुसरण करने वाले, सत्त्व-पुरुष-अन्यताख्याति-मात्र रूप में प्रवाहित होने वाले चित्त के मध्य-मध्य में, अन्य ज्ञान उदित होते हैं जैसे कि 'मैं हूँ' वा 'मेरा है', किं वा 'मैं जानता ' हूँ अथवा 'नहीं जानता हूँ'। क्यों ? क्षीण हो रहे बीज वाले पूर्व के संस्कारों से॥२७॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह कहा है कि विवेकयुक्त चित्त के सांसारिक भोगों के संस्कारों के कारण मध्य मध्य में विवेकज्ञान के विरुद्ध विषयभोग से सम्बद्ध ज्ञानों की उत्पत्ति होती है। अनेक जन्मों से आत्मा सांसारिक भोगों को भोगता आया है। उन भोगों के संस्कार अत्यन्त दृढ़ हो जाने पर उनको अल्प ज्ञान वैराग्य से दूर करना कठिन है। परन्तु असम्भव नहीं है। जब योगाभ्यासी थोड़ा सा भी असावधान हो जाता है तो विवेक, वैराग्य की स्थिति में शैथिल्य आ जाता है। ऐसी स्थिति में भोगों से उत्पन्न संस्कारों से सांसारिक भोगों की ओर ले जाने वाले ज्ञान उत्पन्न होते हैं। सांसारिक अवस्था में व्यक्ति 'मैं' और 'मेरा' इस सम्बन्ध को अत्यन्त दृढ़ बना लेता है। वह यह मानता है कि ये संसार के पदार्थ मेरे हैं और मैं इनका स्वामी हूँ। ये सदा मेरे साथ

रहेंगे। ऐसी मान्यता से बने संस्कार विवेक, वैराग्य के कुछ शिथिल होते ही उभर आते हैं और उन संस्कारों से यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ये पदार्थ मेरे हैं। मैं इनका स्वामी हूँ। इस प्रकार के जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनका नाम 'प्रत्ययान्तराणि' है।

योगाभ्यास करते-करते इन सांसारिक संस्कारों को प्रथम निर्बल करके पुन: दग्धबीजभाव अवस्था में पहुँचा दिया जाता है। इस स्थिति के पश्चात् योग के विरोधी ज्ञान उत्पन्न नहीं होते। इस विषय में यह जानना चाहिये कि शुभ वा अशुभ संस्कारों को उत्पन्न भी किया जा सकता है और समाप्त भी किया जा सकता है। इसलिये शुभ संस्कारों को उत्पन्न करने का और अशुभ संस्कारों को नष्ट करने का प्रयत्न करते रहना चाहिये॥२७॥

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