Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 24

4/24
Sutra
तदसंख्येयवासनाचित्रं अपि परार्थं, संहत्यकारित्वात् ।। ४.२४ ।।

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - कुतश्चैतत्-

अर्थ यह कैसे ?

Word Meaning

तदसंख्येयवासनाभिचित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्॥२४॥

शब्दार्थ (तद्) वह चित्त (असंख्येय-वासनाभिः) अनगिनत वासनाओं से (चित्रम्) चित्रित हुआ (अपि) भी (पर-अर्थम्) पर अर्थात् जीवात्मा के लिये है (संहत्यकारित्वात्) सत्त्व, रजस्, तमस् इन तीन उपादान कारणों से निर्मित होकर प्रयोजन सिद्ध कराने वाला होने से।

सूत्रार्थ - वह चित्त असंख्य वासनाओं से युक्त होने पर भी, अनेक अवयवों से निर्मित होकर कार्य करने वाला होने के कारण 'परार्थ' है। अर्थात् जीवात्मा के भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों को सिद्ध कराने वाला है।

Vyas Bhashya

तदेतच्चित्तमसंख्येयाभिर्वासनाभिरेव चित्रीकृतमपि परार्थं परस्य भोगापवर्गार्थं न स्वार्थं संहत्यकारित्वाद् गृहवत्। संहत्यकारिणा चित्तेन न स्वार्थेन भवितव्यम्। न सुखचित्तं सुखार्थं, न ज्ञानं ज्ञानार्थम्। उभयमप्येतत्परार्थम्। यश्च भोगेनापवर्गेण चार्थेनार्थवान्पुरुषः स एव परः। न परः सामान्यमात्रम्। यत्तु किञ्चित्परं सामान्यमात्रं स्वरूपेणोदाहरेद् वैनाशिकस्तत्सर्वं संहत्यकारित्वात्परार्थमेव स्यात्। यस्त्वसौ परो विशेषः स न संहत्यकारी पुरुष इति॥२४॥

व्या० भा० अ० - वह यह चित्त असंख्य वासनाओं द्वारा चित्रित होने पर भी 'परार्थ' है। 'पर' के भोगापवर्ग के लिए है, अपने लिए नहीं। संघातरूप होकर कार्य करने वाला चित्त अपने लिए नहीं हो सकता, घर के समान। सुखभोग के लिए साधनभूत चित्त सुख के लिए नहीं होता। ज्ञान का साधन चित्त ज्ञान के लिए नहीं होता। ये दोनों ही 'पर' के लिए हैं। जो भोग तथा अपवर्ग रूपी प्रयोजनों से सम्बद्ध प्रयोजन वाला है, वह ही 'पर' है, अन्य कोई सामान्यमात्र 'पर' नहीं है। वैनाशिक जिस किसी सामान्यमात्र को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करे, वह सारा संघात रूप होकर कार्य करने वाला होने से 'पर' के लिए ही होवे। जो तो वह भिन्न, विशेष है और संघातरूप होकर कार्य करने वाला नहीं है, वह पुरुष है।। २४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि वह चित्त युक्त अनेक वासनाओं से भी होता हुआ जीवात्मा के प्रयोजन के लिये है। क्योंकि वह तीन गुणों का संघात रूप होकर कार्य करता है।। जो लोग चित्त को ही सब कुछ मानते हैं और संसार की अन्य किसी वस्तु को स्वीकार नहीं करते। तथा जो लोग चित्त को चेतन पदार्थ मानते हैं, उसके प्रेरक पृथक् आत्मा को नहीं मानते। उनको वास्तविक ज्ञान करवाने के लिये सूत्रकार कहते हैं कि चित्त अनेक जन्म-जन्मान्तर की वासनाओं से चित्रित है। पुनरपि परार्थ है अर्थात् 'पर' के प्रयोजन भोगापवर्ग के लिये है। क्योंकि चित्त तीन गुणों से बना है। सत्त्व, रजस्, तमस् ये तीन उसके उपादान कारण हैं। ये तीनों जड़ पदार्थ हैं। इसी कारण से चित्त भी जड़ पदार्थ है। चित्त सत्त्वादि तीन गुणों का संघातरूप होकर जीवात्मा के कार्य की सिद्धि करता है इसलिये इसे 'संहत्यकारी' कहा है।

जो पदार्थ संहत्यकारी होते हैं अर्थात् अनेक अवयवों से बनकर किसी कार्य की सिद्धि करते हैं, वे अन्य के प्रयोजन के लिये होते हैं। जैसे भवन, यान, घट, पट आदि। ये सभी पदार्थ अपने लिये नहीं हैं। भवन, भवन के लिये नहीं है। घड़ा, घड़े के लिये नहीं है। इसी प्रकार चित्त वा ज्ञान, ज्ञान के लिये नहीं है। परन्तु 'पर' के लिये है। जो भोग और अपवर्ग इन दोनों प्रयोजनों वाला है, वही 'पर' है अर्थात् जीवात्मा है। यदि कोई जीवात्मा को भी संहत्यकारी स्वीकार करेगा तो जीवात्मा भी परार्थ हो जायेगा। जो 'पर' है वह सत्त्वादि तीन गुणों का संघातरूप होकर कार्य करने वाला नहीं है किन्तु नित्य चेतन विशेष पदार्थ है। इससे यह परिज्ञात हो गया कि चित्त सत्त्वादि तीन गुणों से उत्पन्न और अनित्य पदार्थ है। संघातरूप में उत्पन्न होकर कार्य की सिद्धि करने वाला होने से परार्थ = जीवात्मा के प्रयोजनों की सिद्धि के लिये है। अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये नहीं है।

आत्मा एक नित्य एवं चेतन पदार्थ है। वह भोग और मोक्ष दो प्रयोजनों वाला है। जड़ पदार्थों के सम्मिश्रण से नहीं बना है। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि शरीर, इन्द्रियाँ, चित्त आदि पदार्थों को बनाने वाला और कर्मानुसार जीवात्मा को भोग अपवर्ग देने वाला सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है। क्योंकि शरीरादि सभी पदार्थों की रचना आत्मा नहीं कर सकता और न ही कर्मानुसार सब जीवों को भोगापवर्ग की प्राप्ति करवा सकता है। इसलिये एक भोग्य है जो तीन गुणों के संघात से बना है। दूसरा भोक्ता है जो नित्य चेतन, एकदेशी, शुभाशुभ कर्म करने वाला है। तीसरा भोगापवर्ग को देने वाला ईश्वर है। इन तीनों के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जानने, मानने और तदनुसार अनुष्ठान से मानव जीवन सफल होता है। ऋग्वेद में भोक्ता, भोग्य और भोगों को देने वाले ईश्वर का अर्थात् तीनों का उपदेश किया है -

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति॥ऋ. १ / १६४/२०॥

पदार्थ :- हे मनुष्यो ! (सुपर्णा) सुंदर पंखों वाले (सयुजा) समान संबंध रखने वाले (सखाया) मित्रों के समान वर्त्तमान (द्वा) दो पखेरू (समानम्) एक (वृक्षम् ) जो काटा जाता, उस वृक्ष का (परि, षस्वजाते) आश्रय करते हैं (तयोः) उनमें से (अन्य ) एक (पिप्पलम्) उस वृक्ष के पके हुए फल को (स्वादु) स्वादुपन से (अत्ति) खाता है और (अन्य) दूसरा (अनश्नन्) न खाता हुआ (अभि चाकशीति) सब ओर से देखता है अर्थात् सुन्दर चलने-फिरने वा क्रियाजन्य काम को जानने वाले, व्याप्यव्यापकभाव से साथ ही सम्बन्ध रखते हुए मित्रों के समान वर्त्तमान जीव और ईश-परमात्मा समान कार्यकारणरूप ब्रह्माण्ड देह का आश्रय करते हैं। उन दोनों अनादि जीव ब्रह्म में जो जीव है, वह पाप-पुण्य से उत्पन्न सुख-दुःखात्मक भोग को स्वादुपन से भोगता है और दूसरा परमात्मा कर्मफल को न भोगता हुआ उस भोगते हुए जीव को सब ओर से देखता अर्थात् साक्षी है, यह तुम जानो।

भावार्थ :- इस मंत्र में रूपकालङ्कार है। जीव, परमात्मा और जगत् का कारण ये तीन पदार्थ अनादि और नित्य हैं। जीव और ईश- परमात्मा यथाक्रम से अल्प अनन्त चेतन विज्ञानवान् सदा विलक्षण व्याप्यव्यापकभाव से संयुक्त और मित्र के समान वर्त्तमान हैं। वैसे ही जिस अव्यक्त परमाणुरूप कारण से कार्यरूप जगत् होता है वह भी अनादि और नित्य है। समस्त जीव पाप पुण्यात्मक कार्यों को करके उनके फलों को भोगते हैं और ईश्वर एक सब ओर से व्याप्त होता हुआ न्याय से पाप पुण्य के फल को देने वाले न्यायाधीश के समान देखता है। - महर्षि दयानन्द वेदभाष्य॥२४॥

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