इस सूत्र में यह बतलाया है कि यदि पूर्वक्षण वाले चित्त को उत्तरक्षण वाला चित्त जान लेवेगा तो उत्तरक्षण वाले चित्त से पूर्वक्षण वाले चित्त को जानने के क्रम की समाप्ति नहीं होगी। इससे अनवस्था दोष आयेगा और स्मृतियों का सम्मिश्रण दोष भी आयेगा।
इस प्रसंग में चित्त, बुद्धि, ज्ञान ये शब्द पर्यायवाची हैं। क्षणिक चित्त मानने वालों का यह विचार हो सकता है कि पूर्वक्षण में नष्ट हुए चित्त को उत्तरक्षण में उत्पन्न होने वाला चित्त जान लेवेगा तो -
(१) यह दोष आयेगा कि सबसे अन्त में उत्पन्न होने वाले चित्त को कौन सा चित्त जानेगा ? अर्थात् उसको कोई भी चित्त न जान सकेगा।
(२) इस दोष से बचने के लिए यदि यह कहा जाये, कि " एक चित्त को दूसरा चित्त जानेगा, दूसरे को तीसरा जानेगा इस प्रकार चलते जायेंगे, अन्तिम चित्त तो कोई होगा ही नहीं।" तो इस प्रकार से अनवस्था दोष आयेगा।
(३) स्मृतिदोष - जिस पूर्व वाले चित्त ने घड़े को देखा है और उसका अनुभव किया है, उस चित्त को और उसके अनुभव को उत्तरक्षण में उत्पन्न होने वाले चित्त ने जाना। तीसरे क्षण में उत्पन्न होने वाले चित्त ने उन दोनों चित्तों को और उनके अनुभवों को जाना। इस प्रकार से अनेक चित्त उत्पन्न होते जायेंगे और उनके अनुभव भी अनेक उत्पन्न होते जायेंगे। जब उन पूर्व के चित्तों द्वारा किये गये अनुभवों की स्मृति उत्पन्न होगी तो एक स्मृति के उत्पत्तिकाल में अनेक स्मृतियाँ उत्पन्न होंगी। इस स्थिति में किस चित्त की कौन सी स्मृति है यह पता नहीं चलेगा। यह तीसरा दोष आयेगा।
(४) क्षणिक चित्त मानने वाले यह मानते हैं कि पाँच स्कन्ध होते हैं। रूप स्कन्ध, वेदना स्कन्ध, संज्ञा स्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध और संस्कार स्कन्ध। मोक्ष अवस्था आने पर ये पूर्व वाले अशुद्ध स्कन्ध नष्ट हो जाते हैं, उस अवस्था में एक सत्त्व चित्त रहता है और पाँच शुद्ध स्कन्ध रहते हैं। शुद्ध स्कन्धों को प्राप्त करने के लिये गुरुजी के पास रहकर 'ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा' ऐसा वे कहतें हैं और अनित्य अशुद्ध स्कन्धों को छोड़ने का प्रयास करते हैं। जिस नित्य सत्त्व को वे मानते हैं, उसको मानने पर हम नित्य आत्मा मानने वाले न बन जायें इस प्रकार से वे डरते हैं।
उन्होंने इस प्रकार की काल्पनिक मान्यताओं को मान कर बन्ध - मोक्ष की व्यवस्था अस्तव्यस्त कर दी है। इन मान्यताओं को स्वीकार करने से कोई भी व्यक्ति बन्धनों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये सत्त्वादि तीन गुणों से ईश्वर के द्वारा बनाया गया चित्त स्थायी है। जीवात्मा उसके द्वारा विविध ज्ञानों की प्राप्ति और विविध कार्यों का सम्पादन करता है। आत्मा चित्त को और उसके द्वारा जाने गये विषयों को जानता है। जब आत्मा चित्त द्वारा विषयों को जानता है, तब चित्त में संस्कार पड़ जाते हैं। उन संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। उस स्मृति को उत्पन्न करने वाला और पदार्थों को जानने वाला नित्य जीवात्मा है। चित्त जड़ होने से न पदार्थों को जान सकता है और न स्वयं स्मृति को उत्पन्न कर सकता है॥२१॥