इस सूत्र में यह बतलाया है कि एक क्षण में चित्त अपना और अन्य विषयों का निश्चय (ज्ञान) नहीं करवा सकता।
जो लोग (क्षणिकवादी) यह मानते हैं कि चित्त ज्ञानस्वरूप है, आत्मा को पृथक् ज्ञाता मानने की आवश्यकता नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि चित्त, क्षण-स्थायी है अर्थात् एक क्षण में उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है। और एक क्षणकाल में चित्त अपना और अन्य विषयों का ज्ञान भी करवा देता है। उनकी इस मान्यता में यह दोष है कि यदि चित्त क्षणिक है, तो एक ही क्षण तक ठहरने वाला चित्त अपना और अन्य पदार्थों का ज्ञान एक क्षण में कैसे करा देगा ? चित्त परिणामी है। भिन्न-भिन्न क्षणों में तो स्वाकार ग्रहण से अपना ज्ञान और विषयाकार ग्रहण से विषय का ज्ञान करवा सकता है। परन्तु एक क्षण में स्वाकार ग्रहण से अपना ज्ञान और विषयाकार ग्रहण से विषय का ज्ञान नहीं करवा सकता। एक क्षणिक चित्त का उत्पन्न होना, उसके द्वारा पिछले क्षणिक चित्त व अन्य विषयों को जानने की क्रिया करना और इन दोनों क्रियाओं के करने वाले उसी चित्त का कर्त्ता, करण, अधिकरण आदि कारक भी बने रहना, ये तीनों एक क्षण में नहीं हो सकते। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखता कि जो एक क्षण में इन सब कार्यों को कर देता हो। यदि चित्त क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है और उसी एक क्षण में वह कर्म भी कर लेता है, तो उसके द्वारा किये कार्य का कोई प्रयोजन नहीं रहता।
कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्य को इसलिये करता है कि किये हुए कार्य का उसको फल मिलेगा। चित्त क्षण मात्र में नष्ट हो जाने से अपने द्वारा किये कर्म का फल तो भोग ही नहीं पायेगा। अतः चित्त का कर्म व्यर्थ हो गया। यदि वह चित्त बिना प्रयोजन के ही कार्य करता है, तो ऐसे चित्त को मानना व्यर्थ है। इसलिये चित्त एक परिवर्तनशील पदार्थ है। सत्त्वादि तीन जड़ पदार्थों से बना हुआ है। नित्य आत्मा उसको संचालित करने वाला है। आत्मा चित्त के माध्यम से शुभाशुभ कर्मों को करता है। आत्मा के किये हुए शुभाशुभ कर्मों का फल ईश्वर देता है। चित्त स्वयं उत्पन्न नहीं होता। उसका उत्पन्न करनेवाला ईश्वर है। इस मान्यता से योगमार्ग में सफलता मिल सकती है अन्यथा नहीं॥२०॥