इस सूत्र में यह बतलाया है कि धर्माचरण से शरीर और इन्द्रियों के दोषों को दूर करके उनमें विशेष परिवर्तन किया जाता है। उसको 'जात्यन्तर परिणाम' कहते हैं।
शरीर और इन्द्रियों के गोलकों के उपादान कारण पृथिवी आदि पाँच भूत हैं। शरीर के तीन दोष हैं वात, पित्त और कफ। सात धातु हैं रस, रक्त, मांस, मेदस्, अस्थि मज्जा और वीर्य। आठवाँ धातु ओज भी माना जाता है। इन सबमें जो दोष उत्पन्न होते हैं उनको शारीरिक चिकित्सा विज्ञान से जानकर, आयुर्वेद की औषधियों तथा ब्रह्मचर्य के पालन से दूर कर दिया जाता है तो शरीर में उत्तम पदार्थों का समावेश हो जाता है। उससे शरीर में बहुत अधिक परिवर्तन आ जाता है। इन्द्रियों के गोलकों में भी अन्तर आ जाता है उनमें देखने, सुनने आदि का सामर्थ्य बढ़ जाता है। इसी का नाम 'जात्यन्तर परिणाम' है। जैसे किसी छोटे बालक को किसी ने दस वर्ष की अवस्था में देखा हो तो उसी को बीस वर्ष की अवस्था में देखने पर पहिचानना कठिन हो जाता है। इसी प्रकार से व्यक्ति के शरीर में इतना अधिक परिवर्तन आ जाता है कि पूर्व शरीर को पहिचानना कठिन हो जाता है। यह है जात्यन्तर परिणाम अथवा अवस्थान्तर हो जाना।
जो 'जात्यन्तर परिणाम' का यह अर्थ किया जाता है कि योगी अपने मनुष्य शरीर को परिवर्तित करके और इन्द्रियों में भी परिवर्तन करके पशु आदि अन्य जातियों के शरीर का निर्माण कर लेता है। यह असंगत है। मनुष्य शरीर से पशु आदि के शरीर में आने का योगी का क्या प्रयोजन है ? कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति ऊँची सुखप्रद अवस्था को छोड़कर अत्यन्त निम्नकोटि की अवस्था को प्राप्त नहीं करना चाहता। कल्पना कीजिये कि योगी ने अपने मनुष्य शरीर को किसी पशु शरीर में परिवर्तित कर लिया तो योगी उस पशु शरीर में नहीं रह सकता। क्योंकि पशु के स्वभाव में और योगी के स्वभाव में अत्यन्त विरोध होता है। योगी अपने गुण, कर्म, स्वभाव पशु जैसे क्यों बनाना चाहेगा ? क्योंकि जीवात्मा जिस शरीर में जन्म लेता है, उस शरीर में जाने पर उसका स्वभाव भी उस शरीर के अनुरूप बन जाता है। यदि पशु शरीर में जायेगा तो पशु शरीर के अनुरूप स्वभाव बनेगा। पशु मूर्ख है तो योगी भी मूर्ख हो जायेगा। अतः इस अपने मनुष्य शरीर को योगी अन्य पशु आदि जातियों में बदल देता है अर्थात् अपने शरीर को बदल कर पशु आदि शरीर बना देता है, यह मान्यता ठीक नहीं है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की जाति के विषय में यह मान्यता है कि "जाति जो जन्म से लेकर मरणपर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एकरूप से प्राप्त हो, ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह हैं वे जाति शब्दार्थ से लिये जाते हैं।"
इससे यह सिद्ध होता है कि कोई भी मनुष्य, अपने मनुष्य शरीर को पशु आदि जातियों में परिवर्तित नहीं कर सकता। मनुष्यादि के शरीरों, इन्द्रियों एवं मन की रचना को पूर्णरूप से कोई योगी नहीं जान सकता है और न ही कोई उनकी रचना कर सकता है॥२॥