Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 15

4/15
Sutra
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ।। ४.१५ ।।

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - कुतश्चैतदन्याय्यम् ?

अर्थ - यह बात (सत्तात्मक पदार्थों को चित्त की परिकल्पना मात्र मानना) क्यों न्याय विरुद्ध है ? 

Word Meaning

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः॥१५॥

शब्दार्थ - (वस्तु-साम्ये) वस्तु के एक होने पर भी (चित्त-भेदात्) ज्ञानों के भिन्न-भिन्न होने से (तयोः) वस्तु और ज्ञान का (विभक्तः) भिन्न-भिन्न (पन्थाः) अस्तित्व है। 

सूत्रार्थ - वस्तु के एक होने पर भी ज्ञान के भिन्न-भिन्न होने से एक वस्तु को पृथक्-पृथक् रूप में देखा जाता है। इससे सिद्ध है कि जो वस्तु जानी जाती है वह वस्तु और जिस ज्ञान से जानी जाती है वह ज्ञान, दोनों भिन्न-भिन्न अस्तित्व वाले हैं।

Vyas Bhashya

बहुचित्तालम्बनीभूतमेकं वस्तु साधारणम्। तत्खलु नैकचित्तपरिकल्पितं नाप्यनेकचित्तपरिकल्पितम् किं तु स्वप्रतिष्ठम्। कथम् ? वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्। धर्मापेक्षं चित्तस्य वस्तुसाम्येऽपि सुखज्ञानं भवत्य-धर्मापेक्षं तत एव दुःखज्ञानमविद्यापेक्षं तत एव मूढज्ञानं सम्यग्दर्शनापेक्षं तत एव माध्यस्थ्यज्ञानमिति। कस्य तच्चित्तेन परिकल्पितम् ? न चान्यचित्तपरिकल्पितेनार्थेनान्यस्य चित्तोपरागो युक्तः। तस्माद्वस्तु - ज्ञानयोर्ग्राह्यग्रहणभेदभिन्नयोर्विभक्तः पन्थाः। नानयोः संकरगन्धोऽप्यस्तीति। सांख्यपक्षे पुनर्वस्तु त्रिगुणं चलं च गुणवृत्तमिति धर्मादिनिमित्तापेक्षं चित्तैरभिसंबध्यते। निमित्तानुरूपस्य च प्रत्ययस्योत्पद्यमानस्य तेन तेनात्मना हेतुर्भवति॥१५॥

व्या० भा० अ० - बहुत चित्तों का विषय बना हुआ एक पदार्थ (सबके लिए) समान है। वह (पदार्थ) न तो किसी एक चित्त के द्वारा परिकल्पित है न ही अनेक चित्तों के द्वारा परिकल्पित है। अपितु अपने स्वरूप से स्थित है। किस प्रकार ? वस्तु समान होने पर चित्तों के भिन्न होने के कारण। (उदाहरण के लिए) वस्तु के एक होने पर भी धर्म की अपेक्षा से एक चित्त को सुख का ज्ञान होता है, अधर्म की अपेक्षा से उसी (पदार्थ) से दूसरे चित्त को दुःख का ज्ञान होता है, अविद्या के कारण उसी से मूढ़ ज्ञान होता है। सम्यक् ज्ञान की अपेक्षा से उसी (पदार्थ) से चौथे चित्त को उदासीनता का अनुभव होता है। वह (पदार्थ) किस के चित्त के द्वारा परिकल्पित है ? अन्य व्यक्ति के द्वारा परिकल्पित पदर्थ के द्वारा अन्य (व्यक्ति) के चित्त का उपराग सङ्गत नहीं होता। इसलिए ग्राह्यग्रहणात्मक भेद के कारण भिन्न, ज्ञेय और ज्ञान की सत्ता, भिन्न-भिन्न है। इन दोनों का लेशमात्र भी साङ्कर्य (मिश्रण) नहीं है।

साङ्ख्य मत में तो पदार्थ त्रिगुणात्मक, गुणों का स्वभाव चलायमान है इसलिए धर्मादि निमित्तों की अपेक्षा से (वह पदार्थ) चित्तों से सम्बन्ध होता है और (धर्मादि) निमित्तों के अनुरूप उत्पद्यमान ज्ञान का उस-उस रूप से कारण होता है॥१५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि वस्तु समान होने पर भी चित्त भेद के कारण ज्ञान और वस्तु भिन्न-भिन्न हैं।

यहाँ पर 'चित्त' शब्द ज्ञान का वाचक है। अनेक ज्ञानों का आलम्बन बनी हुई एक ही वस्तु समान होती है। वह वस्तु न तो किसी एक ज्ञान द्वारा कल्पित होती है और न अनेक ज्ञानों के द्वारा कल्पित होती है। अर्थात् चित्तों की कल्पनामात्र से वस्तु की सत्ता सिद्ध नहीं है। किन्तु वस्तु अपने स्वरूप से स्थित है। क्योंकि वस्तु एक होने पर भी उसके विषय में भिन्न-भिन्न प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता देखा जाता है। जैसे किसी एक व्यक्ति को देखने से उसके मित्र को सुख का अनुभव होता है। शत्रु को दुःख का अनुभव होता है और विवेकी को हेय-उपादेयशून्यता का अनुभव होता है। अर्थात् उसको देखने से न सुख का और न दुःख का अनुभव होता है। इससे यह ज्ञात होता है कि किसी चित्त (= ज्ञान) की कल्पना मात्र से किसी वस्तु की सत्ता नहीं है। ज्ञान वस्तु को जनाने का साधन है और वस्तु ज्ञेय पदार्थ है ।

वास्तव में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान भिन्न-भिन्न तीन पदार्थ सिद्ध होते हैं। एक व्यक्ति घट को देखता है तो उसको यह अनुभव होता है कि मैं घटपदार्थ को देख रहा हूँ। घट मुझ से भिन्न है। मैं उससे भिन्न हूँ और जिस ज्ञान से घट जाना जाता है, वह ज्ञान मुझ से भिन्न है। इस प्रकार की अनुभूतियों से सिद्ध होता है कि ज्ञान और वस्तु भिन्न भिन्न पदार्थ हैं, यह सब केवल ज्ञानमात्र नहीं है। एक व्यक्ति किसी पदार्थ को लाभप्रद मानकर उसका ग्रहण करता है और दूसरा हानिकारक मानकर उसका परित्याग कर देता है। यदि ज्ञानमात्र ही सब कुछ होता तो किसी वस्तु को ग्रहण करना और किसी को छोड़ना सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि एक ग्रहण करने वाला और एक उसको छोड़ने वाला भिन्न-भिन्न होने चाहियें। कोई भी व्यक्ति न स्वयं को ग्रहण कर सकता है और न छोड़ सकता है। इसलिये ज्ञान वस्तु से भिन्न पदार्थ है और वस्तु ज्ञान से।

संसार में यह देखा जाता है कि जहाँ पर किसी पदार्थ की प्राप्ति होती है वहाँ तीन पदार्थ होते हैं। एक प्राप्त करने वाला प्रापक, दूसरा प्राप्य पदार्थ जिसको वह (प्रापक) प्राप्त करना चाहता है, तीसरा प्राप्ति का साधन (ज्ञान आदि साधन) जिससे प्राप्त करने योग्य को प्राप्त किया जाता है। इससे तीन पदार्थ सिद्ध होते हैं। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि एक साधक है, दूसरा साध्य है, और तीसरा साधन है। इन तीनों को स्वीकार किये बिना मानव का न कोई व्यवहार सिद्ध होता है और न मोक्ष रूपी मानव जीवन का लक्ष्य ही प्राप्त होता है। इसलिये जीवन को सफल बनाने के लिये वेद में तीन पदार्थों को भिन्न भिन्न रूप में बतलाया है॥१५॥

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