इस सूत्र में यह बतलाया है कि वस्तु समान होने पर भी चित्त भेद के कारण ज्ञान और वस्तु भिन्न-भिन्न हैं।
यहाँ पर 'चित्त' शब्द ज्ञान का वाचक है। अनेक ज्ञानों का आलम्बन बनी हुई एक ही वस्तु समान होती है। वह वस्तु न तो किसी एक ज्ञान द्वारा कल्पित होती है और न अनेक ज्ञानों के द्वारा कल्पित होती है। अर्थात् चित्तों की कल्पनामात्र से वस्तु की सत्ता सिद्ध नहीं है। किन्तु वस्तु अपने स्वरूप से स्थित है। क्योंकि वस्तु एक होने पर भी उसके विषय में भिन्न-भिन्न प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता देखा जाता है। जैसे किसी एक व्यक्ति को देखने से उसके मित्र को सुख का अनुभव होता है। शत्रु को दुःख का अनुभव होता है और विवेकी को हेय-उपादेयशून्यता का अनुभव होता है। अर्थात् उसको देखने से न सुख का और न दुःख का अनुभव होता है। इससे यह ज्ञात होता है कि किसी चित्त (= ज्ञान) की कल्पना मात्र से किसी वस्तु की सत्ता नहीं है। ज्ञान वस्तु को जनाने का साधन है और वस्तु ज्ञेय पदार्थ है ।
वास्तव में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान भिन्न-भिन्न तीन पदार्थ सिद्ध होते हैं। एक व्यक्ति घट को देखता है तो उसको यह अनुभव होता है कि मैं घटपदार्थ को देख रहा हूँ। घट मुझ से भिन्न है। मैं उससे भिन्न हूँ और जिस ज्ञान से घट जाना जाता है, वह ज्ञान मुझ से भिन्न है। इस प्रकार की अनुभूतियों से सिद्ध होता है कि ज्ञान और वस्तु भिन्न भिन्न पदार्थ हैं, यह सब केवल ज्ञानमात्र नहीं है। एक व्यक्ति किसी पदार्थ को लाभप्रद मानकर उसका ग्रहण करता है और दूसरा हानिकारक मानकर उसका परित्याग कर देता है। यदि ज्ञानमात्र ही सब कुछ होता तो किसी वस्तु को ग्रहण करना और किसी को छोड़ना सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि एक ग्रहण करने वाला और एक उसको छोड़ने वाला भिन्न-भिन्न होने चाहियें। कोई भी व्यक्ति न स्वयं को ग्रहण कर सकता है और न छोड़ सकता है। इसलिये ज्ञान वस्तु से भिन्न पदार्थ है और वस्तु ज्ञान से।
संसार में यह देखा जाता है कि जहाँ पर किसी पदार्थ की प्राप्ति होती है वहाँ तीन पदार्थ होते हैं। एक प्राप्त करने वाला प्रापक, दूसरा प्राप्य पदार्थ जिसको वह (प्रापक) प्राप्त करना चाहता है, तीसरा प्राप्ति का साधन (ज्ञान आदि साधन) जिससे प्राप्त करने योग्य को प्राप्त किया जाता है। इससे तीन पदार्थ सिद्ध होते हैं। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि एक साधक है, दूसरा साध्य है, और तीसरा साधन है। इन तीनों को स्वीकार किये बिना मानव का न कोई व्यवहार सिद्ध होता है और न मोक्ष रूपी मानव जीवन का लक्ष्य ही प्राप्त होता है। इसलिये जीवन को सफल बनाने के लिये वेद में तीन पदार्थों को भिन्न भिन्न रूप में बतलाया है॥१५॥