Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 14

4/14
Sutra
परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वं ।। ४.१४ ।।

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - यदा तु सर्वे गुणाः, कथमेकः शब्द एकमिन्द्रियमिति ?

अर्थ - जब सभी (पदार्थ) गुण ही हैं तो (उन पदार्थों को) शब्द एक है, इन्द्रिय एक है, यह कैसे कहा जाता है ?

Word Meaning

परिणामैकत्त्वाद्वस्तुतत्त्वम्॥१४॥

शब्दार्थ – (परिणाम-एकत्वाद्) परिणाम के एक होने से (वस्तु-तत्त्वम्) वस्तु का एकत्व उत्पन्न हो जाता है।

सूत्रार्थ - सत्व, रज, तम इन तीन गुणों अर्थात् पदार्थों को ईश्वर ज्ञानपूर्वक उचित मात्रा में संयुक्त करता है। उन तीनों का एक संघात = समुदाय होने से एक वस्तु बन है। 

Vyas Bhashya

प्रख्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां ग्रहणात्मकानां करणभावेनैकः परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियम्। ग्राह्यात्मकानां शब्दतन्मात्रभावेनैकः परिणामः शब्दो विषय इति। शब्दादीनां मूर्तिसमानजातीयानामेकः परिणामः पृथिवीपरमाणुस्तन्मात्रावयवः। तेषां चैकः परिणामः पृथिवी गौर्वृक्षः पर्वत इत्येवमादि। भूतान्तरेष्वपि स्नेहौष्ण्यप्रणामित्वावकाशदानान्युपादाय सामान्यमेकविकारारम्भः समाधेयः।

नास्त्यर्थो विज्ञानविसहचरः, अस्ति तु ज्ञानमर्थविसहचरं स्वप्नादौ कल्पितमित्यनया दिशा ये वस्तुस्वरूपमपह्नुवते, ‘ज्ञानपरिकल्पनामात्रं वस्तु स्वप्नविषयोपमं न परमार्थतोऽस्तीति य आहुस्ते तथे’ ति प्रत्युपस्थितमिदं स्वमाहात्म्येन वस्तु कथमप्रमाणात्मकेन विकल्पज्ञानबलेन वस्तुस्वरूपमुत्सृज्य तदेवापलपन्तः श्रद्धेयवचनाः स्युः॥१४॥

व्या० भा० अ० - प्रकाश, क्रिया, स्थिति स्वभाव वाले ग्रहणात्मक गुणों का इन्द्रिय रूप से एक परिणाम श्रोत्र इन्द्रिय है, ग्राह्यात्मक गुणों का शब्द रूप से एक परिणाम शब्द विषय है। शब्दादि के कठिनत्व आदि धर्म वाले समान जाति वालों का एक परिणाम पृथिवी परमाणु है। इस (पृथिवी परमाणु) का अवयव तन्मात्रा है। उन पृथिवी परमाणुओं का एक परिणाम पृथिवी, गौ, वृक्ष, पर्वत आदि हैं। अन्य भूतो में भी स्नेह (= गीलापन), उष्णता, प्रणामित्व (= गति), अवकाशदान (= स्थान देना) लेकर सजातीय एक विकार का आरम्भ जानना चाहिए।

विज्ञान से अतिरिक्त पदार्थ नहीं है, स्वप्नादि में कल्पित पदार्थरहित ज्ञान तो है, इस प्रकार जो वस्तु के स्वरूप का ही निषेध करते हैं, ऐसा जो कहते हैं कि 'पदार्थ केवल कल्पना है स्वप्न में देखे हुए पदार्थों के समान, वास्तव में नहीं है, वे लोग इस प्रकार अपनी सत्ता के कारण विद्यमान इसी वस्तु का प्रमाणहीन विकल्प - ज्ञान बल के आधार पर वस्तुस्वरूप को छोड़कर उसी वस्तु को असत् सिद्ध करने वाले कैसे विश्वसनीय होंगे ?॥१४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि परिणाम एक होने से, एक वस्तु की उत्पत्ति हो जाती है । यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि यदि सत्त्व आदि व्यक्त और सूक्ष्म रूप में रहने वाले गुणमात्र हैं अर्थात् सभी पदार्थ तीन गुणों के समुदायमात्र हैं, तो फिर यह कैसे कहा जाता है कि यह इन्द्रिय एक है ? शब्द एक है ? इसका समाधान यह है कि परिणाम एक होने से एक वस्तु उत्पन्न हो जाती है। अनेक अवयवों को लेकर ज्ञानपूर्वक एक ऐसी रचना की जाती है कि जिससे किसी प्रयोजन की सिद्धि हो सके। उन अनेक अवयवों से बनी वस्तु को एक कहते हैं। इस प्रकार से तीन गुणों से की गई रचना को एक कहने में कोई दोष नहीं आता।

सत्त्व आदि तीन गुण प्रकाश, क्रिया, स्थिति स्वभाव वाले हैं। उन तीन ग्रहणात्मकों का करणभाव से एक परिणाम होता है जैसे श्रोत्रेन्द्रिय। अर्थात् 'श्रोत्रेन्द्रिय' नामक एक वस्तु की उत्पत्ति हो जाती है। इसी प्रकार से ग्राह्यात्मक तीन गुणों का तन्मात्राभाव से एक परिणाम 'शब्दतन्मात्रा' की उत्पत्ति हो जाती है। इसी प्रकार शब्दादिक = मूर्ति समान जाति वालों का अर्थात् कठोरता आदि धर्मवाली तन्मात्राओं का एक परिणाम 'पृथिवीपरमाणु' उत्पन्न होता है। वह पृथिवीपरमाणु तन्मात्रारूपी अवयवों से बना है अर्थात् 'गन्धतन्मात्रा' नामक अवयवों से मिलकर बना है। उन पृथिवी रूप परमाणुओं से स्थूल-पृथिवी, गौ, वृक्षादि पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार जलादि परमाणु उत्पन्न होते हैं। उनके तन्मात्रावयव हैं अर्थात् वे जल परमाणु इस तन्मात्रा नामक अवयवों से मिलकर बने हैं। उन परमाणुओं से जलादि स्थूलभूत और उन स्थूलभूतों से उसी प्रकार के पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार से ज्ञानपूर्वक तीनों गुणों के एक परिणाम से एक वस्तु अवयवी रूप में उत्पन्न हो जाती है।

इस विषय में कुछ लोगों की मान्यता है कि जिसको एक 'वस्तु' माना जाता है वास्तव में उस वस्तु की कोई सत्ता नहीं है। वह केवल ज्ञानमात्र है। जैसे कि स्वप्नावस्था में ज्ञानमात्र ही रहता है। वहाँ पर कोई भी वस्तु नहीं होती। इसी प्रकार से समस्त पदार्थों के विषय में जानना चाहिये कि वहाँ पर ज्ञानमात्र ही होता है, वस्तु कोई भी नहीं होती। उनकी यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि जो दृष्टान्त दिया गया है, उसमें दोष है। स्वप्नावस्था में जो पदार्थ दिखाई देते हैं, उन पदार्थों को व्यक्ति जागृत अवस्था में देखता और सुनता है। उन्हीं वस्तुओं के संस्कार मन में रहते हैं। उन संस्कारों के कारण स्वप्न में पदार्थ दिखाई देते हैं। यदि व्यक्ति जाग्रत् अवस्था में पदार्थों को न देखे, न सुने और न सोचे तो उन पदार्थों को स्वप्न में नहीं देख सकता। किसी ज्ञान की उत्पत्ति में तीन कारण होते हैं। ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान प्राप्ति का साधन (जानने वाला, जानने योग्य वस्तु और जिस से वस्तु को जानता है वह नेत्रादि साधन) इन तीनों के बिना कोई भी ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिये " ज्ञान मात्र ही सब कुछ है, उससे अतिरिक्त वस्तु नहीं है।" यह मान्यता ठीक नहीं।।

कुछ लोगों का यह भी मत है कि जिसको एक वस्तु कहा जाता है वह एक वस्तु नहीं होती। वह परमाणुओं का समुदायमात्र है। यह मत भी ठीक नहीं है। क्योंकि परमाणुओं के समुदाय मात्र को आँखों से नहीं देखा जा सकता। मिट्टी से बने घड़े में पानी भर कर लाते हैं। यदि मिट्टी का घड़ा परमाणुओं का समुदाय मात्र हो तो उसमें पानी नहीं भरा जा सकता। मिट्टी के परमाणुओं को घड़ा नहीं कह सकते। न ही गौ घटादि नाम ही हो सकते। यह एक वृक्ष है। यह पदार्थ छोटा है, यह बड़ा है इत्यादि व्यवहार से यह सिद्ध होता है कि सत्त्व आदि तीन गुणों से सभी वस्तुयें बनी हैं। यही वास्तविकता है॥१४॥

All Sutras