प्रख्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां ग्रहणात्मकानां करणभावेनैकः परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियम्। ग्राह्यात्मकानां शब्दतन्मात्रभावेनैकः परिणामः शब्दो विषय इति। शब्दादीनां मूर्तिसमानजातीयानामेकः परिणामः पृथिवीपरमाणुस्तन्मात्रावयवः। तेषां चैकः परिणामः पृथिवी गौर्वृक्षः पर्वत इत्येवमादि। भूतान्तरेष्वपि स्नेहौष्ण्यप्रणामित्वावकाशदानान्युपादाय सामान्यमेकविकारारम्भः समाधेयः।
नास्त्यर्थो विज्ञानविसहचरः, अस्ति तु ज्ञानमर्थविसहचरं स्वप्नादौ कल्पितमित्यनया दिशा ये वस्तुस्वरूपमपह्नुवते, ‘ज्ञानपरिकल्पनामात्रं वस्तु स्वप्नविषयोपमं न परमार्थतोऽस्तीति य आहुस्ते तथे’ ति प्रत्युपस्थितमिदं स्वमाहात्म्येन वस्तु कथमप्रमाणात्मकेन विकल्पज्ञानबलेन वस्तुस्वरूपमुत्सृज्य तदेवापलपन्तः श्रद्धेयवचनाः स्युः॥१४॥
व्या० भा० अ० - प्रकाश, क्रिया, स्थिति स्वभाव वाले ग्रहणात्मक गुणों का इन्द्रिय रूप से एक परिणाम श्रोत्र इन्द्रिय है, ग्राह्यात्मक गुणों का शब्द रूप से एक परिणाम शब्द विषय है। शब्दादि के कठिनत्व आदि धर्म वाले समान जाति वालों का एक परिणाम पृथिवी परमाणु है। इस (पृथिवी परमाणु) का अवयव तन्मात्रा है। उन पृथिवी परमाणुओं का एक परिणाम पृथिवी, गौ, वृक्ष, पर्वत आदि हैं। अन्य भूतो में भी स्नेह (= गीलापन), उष्णता, प्रणामित्व (= गति), अवकाशदान (= स्थान देना) लेकर सजातीय एक विकार का आरम्भ जानना चाहिए।
विज्ञान से अतिरिक्त पदार्थ नहीं है, स्वप्नादि में कल्पित पदार्थरहित ज्ञान तो है, इस प्रकार जो वस्तु के स्वरूप का ही निषेध करते हैं, ऐसा जो कहते हैं कि 'पदार्थ केवल कल्पना है स्वप्न में देखे हुए पदार्थों के समान, वास्तव में नहीं है, वे लोग इस प्रकार अपनी सत्ता के कारण विद्यमान इसी वस्तु का प्रमाणहीन विकल्प - ज्ञान बल के आधार पर वस्तुस्वरूप को छोड़कर उसी वस्तु को असत् सिद्ध करने वाले कैसे विश्वसनीय होंगे ?॥१४॥