Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 12

4/12
Sutra
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणां ।। ४.१२ ।।

Bhashya

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Inception

नास्त्यसतः संभवः, न चास्ति सतो विनाश इति द्रव्यत्वेन संभवन्त्यः कथं निवर्तिष्यन्ते वासना इति -

अर्थ - असत् (पदार्थ) की उत्पत्ति नहीं (हो सकती) और न सत्तात्मक (पदार्थ) का विनाश हो सकता है, इसलिए द्रव्य के रूप में होने वाली वासनाएँ किस प्रकार निवृत्त होंगी ? (इसको सूत्र द्वारा कहा जाता है) -

Word Meaning

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद् धर्माणाम्॥१२॥

शब्दार्थ - (अतीत-अनागतम्) अतीत, अनागत [वस्तु] (स्वरूपतः) स्वरूप से विद्यमान (अस्ति) रहती है (अध्व-भेदात्) काल भेद से (धर्माणाम्) धर्मों के।

सूत्रार्थ - जो वस्तु वर्तमान काल में अनुभव का विषय है वह नष्ट होने पर भी अभाव को प्राप्त नहीं हो जाती अपितु अपने कारण स्वरूप में विद्यमान रहती है। तथा जो वस्तु अभी उत्पन्न नहीं हुई है आगे होगी, वह भी उत्पन्न होने से पूर्व अपने स्वरूप में विद्यमान थी, वह भी अभाव से भाव में नहीं आई क्योंकि काल भेद से किसी वस्तु के धर्मों = विशेषताओं की अभिव्यक्ति = प्रतीति और अनभिव्यक्ति = अप्रतीति होती है। 

Vyas Bhashya

भविष्यद्वयक्तिकमनागतम्, अनुभूतव्यक्तिकमतीतम्। स्वव्यापारोपारूढं वर्तमानम्। त्रयं चैतद्वस्तु ज्ञानस्य ज्ञेयम्। यदि चैतत् स्वरूपतो नाभविष्यन्नेदं निर्विषयं ज्ञानमुदपत्स्यत, तस्मादतीतानागतं स्वरूपतोऽस्तीति। किञ्चभोगभागीयस्य वापवर्गभागीयस्य वा कर्मणः फलमुत्पित्सु यदि निरुपाख्यमिति तदुद्देशेन तेन निमित्तेन कुशलानुष्ठानं न युज्येत। सतश्च फलस्य निमित्तं वर्तमानीकरणे समर्थं नापूर्वोपजने। सिद्धं निमित्तं नैमित्तिकस्य विशेषानुग्रहं कुरुते, नापूर्वमुत्पादयतीति।

धर्मी चानेकधर्मस्वभावः। तस्य चाध्वभेदेन धर्माः प्रत्यवस्थिताः। न च यथा वर्तमानं व्यक्तिविशेषापन्नं द्रव्यतोऽस्त्येवमतीतमनागतं च। कथं तर्हि ? स्वेनैव व्यङ्गयेन स्वरूपेणानागतमस्ति, स्वेन चानुभूतव्यक्तिकेन स्वरूपेणातीतमिति, वर्तमानस्यैवाध्वनः स्वरूपव्यक्तिरिति न सा भवत्यतीतानागतयोरध्वनोः। एकस्य चाध्वनः समये द्वावध्वानौ धर्मिसमन्वागतौ भवत एवेति, नाभूत्वा भावस्त्रयाणामध्वनामिति॥१२॥

व्या० भा० अ० - भविष्यत् में अभिव्यक्त होने वाला (पदार्थ) 'अनागत' कहलाता है। जो (पदार्थ) भूतकाल में अभिव्यक्त हो चुका है, वह 'अतीत' है। जो अभिव्यक्ति रूपी व्यापार में विद्यमान है, वह पदार्थ 'वर्त्तमान' कहलाता है। और तीन प्रकार का यह पदार्थ ज्ञान का विषय (ज्ञेय) है। और यह स्वरूप से नहीं होता (तो) विषयरहित होने से ज्ञान उत्पन्न न होता। इसलिए अतीत अनागत (पदार्थ) स्वरूप से है (यह सिद्ध होता है) और भी भोग को सम्पन्न करने वाले वा अपवर्ग को सम्पन्न करने वाले कर्म से उत्पन्न होने वाला फल यदि असत् हो उस उद्देश्य से अर्थात् उस निमित्त से उत्तम अनुष्ठानयुक्त न होवे (अर्थात् व्यर्थ होवे)। और निमित्त (अव्यक्त) रूप में विद्यमान फल को वर्तमानावस्था में लाने में समर्थ है, असत् को उत्पन्न करने में नहीं। उपस्थित हुआ कारण (धर्म) कार्य (फल) को (अभिव्यक्त करने में) विशेष सहायता करता है, अविद्यमान (फल) की उत्पत्ति नहीं करता।

धर्मी अनेक धर्मों से युक्त होने योग्य स्वभाव वाला होता है। उसके धर्म अध्व (काल) भेद से (उसमें) विद्यमान रहते हैं। और जिस प्रकार वर्तमान (धर्म) अभिव्यक्ति से सम्पन्न होकर द्रव्य रूप में रहता है, इस प्रकार अतीत, अनागत (धर्म) नहीं रहते। तो फिर कैसे (रहते है) ? अनागत (धर्म) भविष्यत् में व्यक्त होने योग्य अपने ही स्वरूप में रहता है। अतीत (धर्म) भूतकाल में अभिव्यक्त हो चुके अपने स्वरूप में ही रहता है। वर्तमान काल में (धर्म) अपने विद्यमान (अभिव्यक्त) स्वरूप वाला होता है वह (स्वरूपाभिव्यक्ति) अतीत एवं अनागत (भूत-भविष्यत्) काल वाले (धर्मों) की नहीं होती। एक काल वाले धर्म के समय (शेष) दो कालों में रहने वाले धर्म अव्यक्तस्वरूप में धर्मी में समन्वित रहते ही हैं। इसलिए तीनों कालों में रहने वाले धर्म अभाव से भाव की स्थिति में नहीं आते (यह सिद्धान्त है।)॥१२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह कहा है कि धर्मों के कालभेद के कारण भूत व भविष्यत् वस्तु-स्वरूप से विद्यमान है।

इस पाद के १०वें सूत्र में वासनाओं को अनादि कहा है। ४।११ में हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन के अभाव होने पर उन वासनाओं का अभाव बतलाया है। यहाँ पर प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में उन वासनाओं का अभाव हो जाता है ? इसका उत्तर सूत्रकार ने दिया है कि अतीत और अनागत वस्तु स्वरूप से विद्यमान रहती है। उसमें धर्मों का काल भेद कारण है। भविष्यकाल में अभिव्यक्त होने वाला पदार्थ अनागत होता है अर्थात् वर्तमान काल में वह अपने धर्मी में छिपा रहता है। जो पदार्थ अभिव्यक्त होकर अपने धर्मी में छिप जाता है, वह अतीत होता है। जो वर्त्तमानकाल में अभिव्यक्त हो रहा है, वह वर्त्तमान होता है। मिट्टी में घट विद्यमान है। जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती तब तक वह अनागत है। अभिव्यक्ति होने पर वर्त्तमान है और टूट फूट जाने पर अतीत है। इसी प्रकार से प्रत्येक पदार्थ अतीत, अनागत रूप से वर्त्तमान रहता है। उसका अभाव नहीं होता। यह सत्कार्यवाद का सिद्धान्त है कि अभाव से भाव और भाव से अभाव की उत्पत्ति नहीं होती। सांख्कार महर्षि कपिल जी ने कहा है कि -

"उपादाननियमात् "॥सांख्यदर्शन १२ / ११५॥

अर्थात् उपादान कारण में जो गुण एवं स्वभाव होते हैं वे ही उसके कार्य में आते हैं। गीता में कहा है कि -

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः॥गीता २ / १६॥

अर्थात् अभाव से भाव और भाव से अभाव उत्पन्न नहीं होता।

यदि अतीत, अनागत स्वरूप से वर्तमान न होते तो भूत-भविष्यत् पदार्थों का ज्ञान किसी को भी नहीं होता। परन्तु भूत-भविष्यत् पदार्थों का ज्ञान सामान्य जनों को अल्पमात्रा में और योगियों को अधिक मात्र में होता है। जो कर्म लौकिक फल प्राप्ति के लिये अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये किये जाते हैं उनका फल भविष्यत् काल में मिलेगा। यदि कर्मों के फल को अनागत रूप में न माना जाय तो व्यक्ति शुभ कर्म करना छोड़ देवें। धर्माचरण (कर्म) फलप्रदाता के पास पहले से विद्यमान फल को ही दिलवाता है। अभाव से भाव की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। धर्मी अनेक स्वभावों वाला है। जब उसके धर्मों को अभिव्यक्त करने वाला कारण उपस्थित होता है तब उसके धर्मों की अभिव्यक्ति होती है और जब अभिव्यक्ति करने वाला कारण उपस्थित नहीं होता, तब अनभिव्यक्ति रहती है। इसलिये कालभेद से सभी पदार्थ स्वरूप से वर्तमान रहते हैं, उनका अभाव कभी भी नहीं होता। हेतु, फल आदि जो वासनाओं का आश्रय है उनको योगी दूर कर देता है तो वे अपने उपादान कारण प्रकृति में लीन हो जाती हैं। उन वासनाओं का अभाव नहीं होता॥१२॥

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