Yogdarshanam Paad 4 / Sutra 11

4/11
Sutra
हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषां अभावे तदभावः ।। ४.११ ।।

Bhashya

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Word Meaning

हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः॥११॥

शब्दार्थ - (हेतु-फल-आश्रय-आलम्बनैः) हेतु, फल, आश्रय तथा आलम्बन इन चार कारणों से (संगृहीतत्वात्) वासनाओं के उत्पन्न होने से (एषाम् ) इन चार कारणों के (अभावे) न रहने की स्थिति में (तद्-अभाव:) उन वासनाओं का अभाव हो जाता है।

सूत्रार्थ - हेतु = धर्माधर्म, सुख-दुःख, राग-द्वेष तथा उनका मूल अविद्या; फल = जाति, आयु, भोग; आश्रय वासनाओं का आश्रय भोगोन्मुख चित्त; आलम्बन इन्द्रियों के रूप रसादि विषय, वासनाओं की विद्यमानता में कारण हैं। तथा इनके न रहने पर 'वासनाओं का अभाव' हो जाता है।

Vyas Bhashya

हेतुः - धर्मात्सुखमधर्माद्दुःखं, सुखाद्रागो दुःखाद्वेषस्ततश्च प्रयत्नस्तेन मनसा वाचा कायेन वा परिस्पन्दमानः परमनुगृह्णात्युपहन्ति वा। ततः पुनर्धर्माधर्मौ सुखदुःखे रागद्वेषाविति प्रवृत्तमिदं षडरं संसारचक्रम्।

अस्य च प्रतिक्षणमावर्तमानस्याविद्या नेत्री मूलं सर्वक्लेशानामित्येष हेतुः। फलं तु यमाश्रित्य यस्य प्रत्युत्पन्नता धर्मादेः, नह्यपूर्वोपजनः। मनस्तु साधिकारमाश्रयो वासनानाम्। न ह्यवसिताधिकारे मनसि निराश्रया वासनाः स्थातुमुत्सहन्ते। यदभिमुखीभूतं वस्तु यां वासनां व्यनक्ति तस्यास्तदालम्बनम्। एवं हेतुफलाश्रयालम्बनैरेतैः संगृहीताः सर्वा वासनाः। एषामभावे तत्संश्रयाणामपि वासनानामभावः॥११॥

व्या० भा० अ० - हेतु-धर्म से सुख और अधर्म से दुःख (होता है)। सुख से राग और दु:ख से द्वेष होता है। उस (राग-द्वेष ) से प्रयत्न होता। उस (प्रयत्न) से मन से, वाणी से अथवा शरीर से चेष्टा करता हुआ दूसरों पर दया करता है वा उनको कष्ट देता है। उससे पुनः धर्माधर्म (उससे) सुख-दु:ख, ( उससे) राग-द्वेष होते हैं, इस प्रकार छः आरों वाला संसारचक्र प्रवृत्त होता है।

प्रतिक्षण घूमने वाले इस संसार चक्र को आगे ले जाने वाली 'अविद्या' है जो सब क्लेशों का मूल है। इसलिये यह ( वासनाओं का ) 'हेतु' है। 'फल' तो वह है जिस को लक्ष्य बनाकर जिस धर्मादि (अदृष्ट) की उत्पत्ति होती है। क्योंकि किसी असद्वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती। साधिकार मन वासनाओं का 'आश्रय' है। मन के समाप्ताधिकार ( कृतकृत्य) होने पर आश्रयहीन वासनाएँ टिक नहीं सकतीं। सम्मुख आया हुआ जो पदार्थ जिस वासना को व्यक्त करता है उस (वासना) का वह (पदार्थ) 'आलम्बन' है। इस प्रकार ये सारी वासनाएँ इन हेतु, फल, आश्रय, आलम्बन से सङ्गृहीत होती हैं। इन चारों का अभाव होने पर इनसे सम्पादित वासनाओं का भी अभाव हो जाता है॥११॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि हेतु, फल, आश्रय, आलम्बनों के द्वारा वासनाओं के संगृहीत होने से इनके अभाव होने पर वासनाओं का अभाव हो जाता है। हेतु - धर्माचरण से सुख की प्राप्ति होती है, अधर्माचरण से दुःख की प्राप्ति होती है। धर्माचरण का अभिप्राय है सकाम शुभ कर्म और अधर्माचरण का अभिप्राय अशुभ कर्म हैं। सुख भोग से सुख के संस्कार बनते हैं और दुःख भोगने से दुःख के संस्कार बनते हैं।

सुख के जिस साधन से सुख की प्राप्ति होती है, उस (साधन) में और उससे मिलने वाले सुख में राग उत्पन्न होता है। उस राग के कारण व्यक्ति उस कार्य को करता है। उस कार्य के सम्पादन में जो व्यक्ति सहायता देता है, उसको वह लाभ पहुँचाता है और जो उस कार्य में बाधा उपस्थित करता है उसकी हानि करता है। इसी प्रकार से अधर्माचरण से दुःख मिलता है, दुःख के अनुभव से दुःख के संस्कार उत्पन्न होते हैं। दुःख और दुःख के साधनों से व्यक्ति द्वेष करता है। द्वेष के कारण मन, वाणी और शरीर से फिर अधर्माचरण करता है। इस प्रकार से व्यक्ति सकाम शुभ कर्म और अशुभ कर्मों को करता रहता है। धर्माधर्म, सुख-दुःख, राग-द्वेष, षडरों वाला यह संसार चक्र चलता रहता है। इस सतत वर्तमान चक्र का मूल कारण 'अविद्या' है। इसी को 'हेतु' कहा है।

फल - प्रायः व्यक्ति धन-सम्मान आदि लौकिक सुखों को लक्ष्य बनाकर कर्म करता रहता है। जिन लौकिक सुखों आदि को लक्ष्य बनाकर व्यक्ति कर्म करता है, उन्हें 'फल' कहते हैं। जब तक लौकिक सुखों को लक्ष्य बनाकर व्यक्ति कर्म करता रहेगा तब तक उसमें वासनायें बनती रहेंगी।

आश्रय - साधिकार मन अर्थात् जिस मन ने भोग और अपवर्ग को सिद्ध नहीं किया है, वह इन वासनाओं का 'आश्रय' है। जब मन भोग और अपवर्ग इन दो प्रयोजनों को पूर्ण कर लेता है, तब वासनायें नहीं रह सकतीं।

आलम्बन - समक्ष उपस्थित हुई वस्तु जिससे वासनायें अभिव्यक्त होती हैं, वह 'आलम्बन' कहाता है। जब तक राग-द्वेषयुक्त चित्त के समक्ष वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाले पदार्थ उपस्थित होते रहते हैं, तब तक वासनाएँ अभिव्यक्त भी होती रहती हैं और नई भी बनती रहती हैं। परन्तु विवेक वैराग्य हो जाने पर वासनाएँ न तो अभिव्यक्त होती हैं और न ही नई उत्पन्न होती हैं। हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन से वासनाओं का संग्रह होता है। इनका अभाव होने पर वासनाओं का भी अभाव हो जाता है। योगाभ्यासी व्यक्ति का यह मुख्य कर्तव्य है कि हेतु आदि वासनाओं के कारणों को दूर करने का प्रयास करे। इस विषय में पहले भी लिखा गया है कि वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, श्रवण- मनन, यम आदि आठ अङ्गों का अनुष्ठान, सत्पुरुषों का सङ्ग, निष्काम कर्म आदि के करने से ये हेतु आदि वासनाओं के आश्रय दूर हो जाते हैं और इनके दूर होने से वासनायें भी दूर हो जाती हैं॥११॥

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