तासां वासनानामशिषोनित्यत्वादनादित्वम्। येयमात्माशीर्मा न भूवं भूयासमिति सर्वस्य दृश्यते सा न स्वाभाविकी। कस्मात् ? जातमात्रस्य जन्तोरननुभूतमरणधर्मकस्य द्वेषदुःखानुस्मृतिनिमित्तो मरणत्रासः कथं भवेत् ? न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्तमुपादत्ते। तस्मादनादिवासनानुविद्धमिदं चित्तं निमित्तवशात्काश्चिदेव वासनाः प्रतिलभ्य पुरुषस्य भोगायोपावर्तत इति।
घटप्रासादप्रदीपकल्पं संकोचविकासि चित्तं शरीरपरिमाणाकारमात्रमित्यपरे प्रतिपन्नाः। तथा चान्तराभावः संसारश्च युक्त इति। वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य संकोचविकासिनीत्याचार्यः।
तच्च धर्मादिनिमित्तापेक्षम्। निमित्तं च द्विविधम्- बाह्यमाध्यमात्मिकं च। शरीरादिसाधनापेक्षं बाह्यं स्तुतिदानाभिवादनादि। चित्तमात्राधीनं श्रद्धाद्याध्यात्मिकम्। तथा चोक्तम्- ये चैते मैत्र्यादयो ध्यायिनां विहारास्ते बाह्यसाधननिरनुग्रहात्मानः प्रकृष्टं धर्ममभिनिर्वर्तयन्ति। तयोर्मानसं बलीयः। कथम् ? ज्ञानवैराग्ये केनातिशय्येते ? दण्डकारण्यं च चित्तबलव्यतिरेकेण कः शारीरेण कर्मणा शून्यं कुर्तुमुत्सहेत समुद्रमस्त्यवद्वा पिबेत् ?॥१०॥
व्या० भा० अ० - कामना के नित्य होने से उन वासनाओं की (प्रवाह से) अनादिता सिद्ध होती है। जो यह आत्मा की कामना है कि मैं न रहूँ ऐसा न हो (अर्थात् सदा रहूँ, ऐसी प्रत्येक की कामना दिखती है, वह स्वाभाविक नहीं है। क्यों ? उसी समय उत्पन्न प्राणी (बालक) का जिसने (इस जन्म में) मरणधर्म का अनुभव नहीं किया (उसको) द्वेषात्मक, पूर्वानुभवजन्य दुःख की स्मृति से उत्पन्न मरणभय होता है, वह कैसे होवे ? और स्वाभाविक पदार्थ कारण का आश्रय नहीं लेता। इसलिये ( प्रवाह से ) अनादि काल की वासनाओं से सम्बद्ध यह चित्त (कर्माशयरूप) निमित्त के कारण (उनमें से) कुछ ही वासनाओं को लेकर पुरुष के भोग के लिए प्रवृत्त होता है।
घट (एवं) भवन में रखे दीपक के सदृश सङ्कोच-विकास (स्वभाव वाला) चित्त केवल शरीर के परिमाण के आकार वाला है, ऐसा कुछ आचार्य मानते हैं। ऐसा मानने से बाधा का अभाव होता है तथा पुनर्जन्म भी सिद्ध होता है। इस विभु चित्त की वृत्ति सङ्कोच - विकास वाली है, ऐसा (योग के) आचार्य मानते हैं।
और वह (सङ्कोच-विकास-शील-वृत्ति) धर्माधर्मरूपी निमित्त के कारण होती है। और (धर्माधर्म) निमित्त बाह्य एवं आध्यात्मिक नाम से दो प्रकार का होता है। शरीर आदि साधनों की अपेक्षा रखने वाला स्तुतिदान अभिवादन आदि (निमित्त) बाह्य है, श्रद्धा आदि आध्यात्मिक (निमित्त) है। और वैसा ही कहा है - और ये जो योगियों के मैत्री आदि व्यापार हैं वे बाह्य साधनों की अपेक्षा न रखने वाले (होने से) उत्कृष्ट धर्म को उत्पन्न करते हैं। उन (बाह्य आध्यात्मिक निमित्तों) में से मानस (आध्यात्मिक निमित्त) बलवान् है। किस प्रकार ? ज्ञान और वैराग्य से बढ़कर कौन (हो सकता) है ? चित्तबल के बिना (केवल) शारीरिक कर्म से कौन दण्डकारण्य को निर्जन करने का साहस करे ? अथवा अगस्त्य के सदृश कौन समुद्र को पीवे ?॥१०॥