Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 55

3/55
Sutra
सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यं इति ।। ३.५५ ।।

Bhashya

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Word Meaning

सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति॥५५॥

शब्दार्थ - (सत्त्व-पुरुषयोः) बुद्धि और पुरुष (जीव) को (शुद्धि - साम्ये) शुद्धि समान होने पर (कैवल्यम्) मोक्ष होता है (इति) यह पद तृतीय पाद की समाप्ति का सूचक है। 

सूत्रार्थ - रज व तम के मल से रहित होना तथा बुद्धि और पुरुष की अन्यताख्याति में प्रतिष्ठित होना और क्लेशों का दग्धबीज होना, बुद्धि की शुद्धि है। जीवात्मा में भोग का अभाव हो जाना पुरुष की शुद्धि है। बुद्धि और पुरुष इन दोनों की समानरूप से शुद्धि हो जाने पर 'मोक्ष' प्राप्त होता है।

Vyas Bhashya

यदा निर्धूतरजस्तमोमलं बुद्धिसत्त्वं पुरुषस्यान्यताप्रतीतिमात्राधिकारं दग्धक्लेशबीजं भवति तदा पुरुषस्य शुद्धिसारूप्यमिवापन्नं भवति, तदा पुरुषस्योपचरितभोगाभावः शुद्धिः। एतस्यामवस्थायां कैवल्यं भवतीश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेकजज्ञानभागिन इतरस्य वा। न हि दग्धक्लेशबीजस्य ज्ञाने पुनरपेक्षा काचिदस्ति। सत्त्वशुद्धिद्वारेणैतत्समाधिजमैश्वर्यं ज्ञानं चोपक्रान्तम्। परमार्थतस्तु ज्ञानाददर्शनं निवर्तते। तस्मिन्निवृत्ते न सन्त्युत्तरे क्लेशाः। क्लेशाभावात्कर्मविपाकाभावः। चरिताधिकाराश्चैतस्यामवस्थायां गुणा न पुरुषस्य दृश्यत्वेन पुनरुपतिष्ठन्ते। तत्पुरुषस्य कैवल्यम्, तदा पुरुषः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली भवति॥५५॥

व्या० भा० अ० - जिस समय रजस् तमस् के मल से रहित (सत्त्वगुणप्रधान) बुद्धि, पुरुष के अन्यताप्रत्यय मात्र में प्रतिष्ठित, क्लेशों की दग्धबीजावस्था को प्राप्त होती है तब पुरुष की शुद्धि के सदृश स्वरूप वाली हो जाती है। तब उपस्थित भोगों का अभाव पुरुष की शुद्धि कही जाती है। इस अवस्था में 'कैवल्य' होता है, ईश्वर (विभूति सम्पन्न) हो चाहे अनीश्वर (विभूतिरहित) हो, विवेकज ज्ञान युक्त हो अथवा अन्य हो। जिस (योगी के) क्लेशों के बीज दग्ध हो गए हों उसको अन्य ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं है। बुद्धि की शुद्धि के माध्यम से समाधिजनित ऐश्वर्य और ज्ञान कहा गया है। वस्तुतः ज्ञान से अज्ञान निवृत्त होता है। उसके निवृत्त होने पर (अस्मितादि) अगले क्लेश नहीं (होते ) हैं। क्लेशों के अभाव में कर्मों का फल नहीं होता। इस अवस्था में गुण चरिताधिकार अर्थात् भोगापवर्ग को सम्पादित कर चुके होने से पुरुष के दृश्य के रूप में पुनः उपस्थित नहीं होते। वह पुरुष का 'कैवल्य' है। तब पुरुष केवलस्वरूप ज्योति वाला, निर्मल, केवली होता है॥५५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि सत्त्व (बुद्धि) की और जीवात्मा की शुद्धि होने पर मोक्ष हो जाता है। जब रजोगुण और तमोगुण के मल से रहित सत्त्वात्मक बुद्धि, पुरुष की अन्यताख्याति अर्थात् बुद्धि और आत्मा के स्वरूप ज्ञान में प्रतिष्ठित हो जाती है = दोनों का पृथक्-पृथक् ज्ञान करवा देती है और दग्धक्लेश बीज वाली होती है तब वह पुरुष की शुद्धि के सदृश शुद्ध हो जाती है। अर्थात् जीवात्मा तो स्वभाव से शुद्ध है। उसकी शुद्धि अविद्या आदि मलों के दूर होने पर पूर्ण रूपेण हो जाती है। परन्तु बुद्धि तीन गुणों से बनी है अतः उसकी शुद्धि पुरुष से न्यून ही होती है पर पुरुष जैसी कही जाती है। ऐसी अवस्था में जीवात्मा सांसारिक भोगों से रहित हो जाता है और उसको मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सम्प्रज्ञात समाधि की परिपक्व अवस्था में विवेकख्याति उत्पन्न होती है। उससे भी पर वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। पर वैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि होती है। उससे आत्मा को अपना और ईश्वर का स्वरूप अच्छे प्रकार से परिज्ञात हो जाता है। ऐसी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। चाहे इस पाद में कही गई सिद्धियाँ प्राप्त हों वा न हों। वास्तविकता तो यह है कि शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्धोपासना से ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप का वास्तविक ज्ञान होता है, उससे अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। कर्म विपाक (फल) भोग का अभाव हो जाता है। सत्त्व आदि तीन गुण, भोग और अपवर्ग के प्रयोजन को पूर्ण करके अपना अधिकार समाप्त कर देते हैं अर्थात् अब वे गुण योगी का अगला जन्म उत्पन्न नहीं कर सकेंगे। यह जीवात्मा का 'कैवल्य' है। इस अवस्था में जीवात्मा अपने स्वरूप को और ईश्वर के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान जाता है। यह ईश्वर साक्षात्कार की स्थिति है। इससे यह समझना चाहिये कि केवल जीवात्मा के स्वरूप ज्ञान से कैवल्य नहीं होता किन्तु अपने स्वरूप को जानकर ईश्वर के स्वरूप को जानने से कैवल्य होता है। जीवात्मा आनन्दस्वरूप नहीं है और न सर्वज्ञ है। जीवात्मा के स्वाभाविक ज्ञान से न लौकिक व्यवहार सिद्ध होता है और न मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये यह जानना चाहिये कि ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से ही व्यवहार की सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कुछ लोगों का यह मत है कि योगदर्शन में जितनी सिद्धियाँ बतलाई हैं मोक्ष प्राप्ति के लिये उन सब सिद्धियों को प्राप्त करना चाहिये। इस विषय में भाष्यकार ने स्पष्ट कर दिया है कि "ईश्वरस्य अनीश्वरस्य वा।" इसका अभिप्राय यह है कि इस पाद में लिखित सिद्धियों को प्राप्त करने वाला योगी, 'ईश्वर' और (सिद्धियों को) प्राप्त न करने वाला 'अनीश्वर' कहा गया है। जिसने यम नियम आदि अष्टाङ्ग योग का अनुष्ठान किया है, अपर वैराग्य से सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त किया है, पर वैराग्य और ईश्वर प्रणिधान से असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति की है, निष्काम कर्मों का अनुष्ठान किया है और तीन एषणाओं का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी तीसरे पाद में कही गई सिद्धियों को प्राप्त करे वा न करे, पुनरपि मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इसलिये मोक्ष प्राप्त करना मुख्य प्रयोजन है तीसरे पाद की सिद्धियों को प्राप्त करना नहीं॥५५॥

Footnote

॥इति तृतीयो: विभूति-पादः॥

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