इस सूत्र में विवेकज ज्ञान का लक्षण किया है। उपदेशादि कारणों के बिना अपनी ही प्रतिभा से उत्पन्न होने वाला, सब पदार्थों को विषय बनाने वाला अर्थात् सभी पदार्थों को जनाने वाला, भूत, भविष्यत्, वर्तमान सभी प्रकार से पदार्थों को जनाने वाला और बिना क्रम के एक साथ उत्पन्न होने वाला ज्ञान, 'विवेकज ज्ञान' कहाता है। जो समस्त दुःखों एवं बन्धनों से तैरा देवे, वह 'तारक' कहा जाता है। इस ज्ञान की सिद्धि के पश्चात् साधक समस्त बन्धनों से छूट जाता है।
सर्वविषय का अर्थ है "समस्त पदार्थों को विषय करने वाला"। सभी पदार्थों को जनाने का तात्पर्य यह है कि जिन पदार्थों का जानना मुक्ति प्राप्ति के लिये आवश्यक है उन सबको जनाने वाला। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि ईश्वर की भाँति समस्त पदार्थों को जनाने वाला। क्योंकि एकदेशी होने से ईश्वर की भाँति जीवात्मा सर्वज्ञ नहीं हो सकता, ईश्वर चेतन व सर्वदेशी होने से सर्वज्ञ है।
सर्वथाविषय का अर्थ भूत भविष्यत् और वर्तमानस्थ सूक्ष्म, स्थूल सभी पदार्थों का विशेष ज्ञान करवाने वाला है। जैसे आज एक व्यक्ति २५ वर्ष का युवा है, आज से २० वर्ष पहले वह ५ वर्ष का बालक था, खेलता कूदता था। आज से ५० वर्ष पश्चात् वह वृद्ध हो जायेगा तब उसे उठने बैठने, चलने-फिरने, देखने-सुनने आदि कार्यों में कठिनाई होगी। अर्थात् तीन कालों में किस किस पदार्थ की क्या क्या स्थिति होती है, इसका विशेष ज्ञान विवेकज ज्ञान करवा देता है। परन्तु समस्त पदार्थों का सभी प्रकार से जानना, ईश्वर के लिये ही सम्भव है, जीव के लिये नहीं। क्योंकि जीव अल्पज्ञ और एकदेशी है। अतः वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता। योगी को जहाँ पर भी सर्वज्ञ कहा जाता है वहाँ पर ज्ञेय पदार्थ कुछ सीमित होते हैं जिनके विषय में योगी विशेषरूप से जानता है। मुक्ति के लिए आवश्यक ज्ञान की दृष्टि से भी योगी को सर्वज्ञ कह दिया जाता है उसका अर्थ है - 'जितना ज्ञान मोक्ष प्राप्ति में आवश्यक है, उतना ज्ञान प्राप्त कर लेना'।
अक्रम - बिना क्रम के एक साथ अनेक पदार्थों को जनाने वाला। अक्रम शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। प्रथम यह कि बहुत शीघ्रता से जनाने वाला। जिसका पदार्थों को जनाने का क्रम तो है परन्तु वह ज्ञात नहीं होता। उदाहरण:- अमेरिका देश से आकाशवाणी (रेडियो) के माध्यम से ओम् शब्द का उच्चारण किया। उसको भारत देश आने में बहुत न्यून समय लगा। उस देश से चलकर भारत तक जितना स्थान है उस स्थान को पार करते-करते एक अँगुल स्थान को पार करने में कितना समय लगा, यह जानना अत्यन्त कठिन है। इसलिये यह मान लिया जाता है कि एक अँगुल स्थान को पार करने में कुछ भी समय नहीं लगा।
यद्यपि जितने समय में अनेक पदार्थों का ज्ञान होना माना जाता है उस काल के भी सूक्ष्म दृष्टि से विभाग हो सकते हैं। परन्तु एक परिभाषा बनाई गई कि इतने समय को एक कहा जायगा अर्थात् 'एक क्षण' कहा जायेगा। इसलिये 'अक्रम' का एक अर्थ यह है, कि जिसमें ज्ञानों का क्रम तो होता है परन्तु वह क्रम जाना नहीं जाता। 'अक्रम' का दूसरा अर्थ यह है कि जिसमें क्रम है ही नहीं अर्थात् एक ही क्षण में अनेक पदार्थों का ज्ञान एक साथ होता है। व्यासभाष्य में क्षण को समझाने के लिये एक दृष्टान्त दिया है। जैसे किसी द्रव्य के विभाग करते करते जो उसका अन्तिम भाग बच जाये अर्थात् जिसके आगे विभाग न हो सकें वह 'परमाणु' है। इसी प्रकार से समय के विभाग करते-करते जिसका पुन: विभाग न हो सके वह काल 'क्षण' है। यहाँ पर द्रव्य को ‘परमाणु' कहा है और विभाग रहित बतलाया है। वैसे ही जिस काल का विभाग न हो सके उसे 'क्षण' कहा है। इस एक क्षण में योगी को अनेक पदार्थों का ज्ञान एक साथ होता है। 'अक्रम' शब्द का यह दूसरा अर्थ कुछ अन्य विद्वान् करते हैं।
सत्त्वादि तीन गुणों से महत्तत्त्व की उत्पत्ति मानी है। उससे अहंकार की उत्पत्ति मानी है। अहंकार से पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच तन्मात्राओं और एक मन की उत्पत्ति मानी है। पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच भूतों की उत्पत्ति मानी है।
तन्मात्राओं से बने पृथिवी आदि परमाणु, जिनसे स्थूल भूत पृथ्वी जल आदि की उत्पत्ति होती है। उन परमाणुओं को यहाँ पर विभाजित न होने वाला द्रव्य कहा है। जिस द्रव्य को यहाँ पर न विभाजित होने वाला परमाणु कहा है, उसके भी विभाग हो जाते हैं। जब स्थूलभूतों का विनाश होता है तब उनके सूक्ष्म भूत बन जाते हैं। जिनको यहाँ पर परमाणु कहा है। उनका विनाश होता है तो वे तन्मात्राओं में लीन हो जाते हैं। तन्मात्रायें अहंकार में, अहंकार महत्तत्त्व में और महत्तत्त्व प्रकृति में लीन हो जाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जिस द्रव्य का परमाणु विभाग रहित माना है, उसके तो विभाग हो जाते हैं। परन्तु परमाणु का दृष्टान्त देकर क्षण को विभाग रहित बतलाया है। यहाँ पर भाष्यकार ने 'क्षण का लक्षण' किया है। लिखा है कि जितने काल में परमाणु स्वस्थान को छोड़ता है उतने काल को 'क्षण' कहा जाता है और यह भी लिखा है कि जैसा परमापकर्ष पर्यन्त द्रव्य 'परमाणु' है उसी प्रकार परमापकर्ष पर्यन्त काल 'क्षण' है।
सूत्रकार एवं भाष्यकार के अनुसार परमाणु के कारण जो तन्मात्राएँ हैं वे स्वयं कार्यद्रव्य हैं अतः सावयव हैं। इनका कारण अहंकार, अहंकार का कारण महत्तत्व और महत्तत्व के कारण सत्त्वरजस्तमस् द्रव्य हैं। जिस प्रकार परमाणु सावयव हैं और उसके अवयव होते हैं उसी प्रकार क्षण (काल) सावयव है वा नहीं, यह ज्ञातव्य है। एक परमाणु के स्वस्थान को छोड़ने में जितना काल लगता है उतना काल तन्मात्रा, अहङ्कार एवं महत्तत्व द्रव्यों के स्वस्थान को छोड़ने में नहीं लगना चाहिये। क्योंकि वे परमाणुओं से सूक्ष्म हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि 'क्षण' के भी अवयव हो सकते हैं। यह हो सकता है कि क्षण के अवयवों को पकड़ने में कठिनाई होती होगी।
यह विद्वानों के लिए विचारणीय है कि क्षण (काल) के अवयव होते हैं वा नहीं॥५४॥