Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 52

3/52
Sutra
क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानं ।। ३.५२ ।।

Bhashya

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Word Meaning

क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्॥५२॥

शब्दार्थ - (क्षण-तत्क्रमयोः) क्षण और उसके क्रम में (संयमात्) संयम करने से (विवेकजं, ज्ञानम्) विवेकज ज्ञान उत्पन्न होता है।

सूत्रार्थ - अत्यन्त लघु काल का नाम 'क्षण' है और क्षणों के प्रवाह का न टूटना 'क्रम' है। इन क्षणों और क्रमों में संयम करने से 'विवेकज ज्ञान' उत्पन्न होता है। 

Vyas Bhashya

यथापकर्षपर्यन्तं द्रव्यं परमाणुरेवं परमापकर्षपर्यन्तः कालः क्षणः। यावता वा समयेन चलितः परमाणुः पूर्वदेशं जह्यादुत्तरदेशमुपसंपद्येत स कालः क्षणः, तत्प्रवाहविच्छेदस्तु क्रमः। क्षणतत्क्रमयोर्नास्ति वस्तुसमाहार इति बुद्धिसमाहारो मुहूर्ताहोरात्रादयः। स खवल्यं कालो वस्तुशून्यो बुद्धिनिर्माणः शब्दज्ञानानुपातो लौकिकानां व्युत्थितदर्शनानां वस्तुस्वरूप इवावभासते।

क्षणस्तु वस्तुपतितः क्रमावलम्बी। क्रमश्च क्षणानन्तर्यात्मा। तं कालविदः काल इत्याचक्षते योगिनः। न च द्वौ क्षणौ सह भवतः। क्रमश्च न द्वयोः सहभुवोरसंभवात्, पूर्वस्मादुत्तरस्य भाविनो यदानन्तर्यं क्षणस्य स क्रमः। तस्माद्वर्तमान एवैकः क्षणो न पूर्वोत्तरक्षणाः सन्तीति। तस्मान्नास्ति तत्समाहारः। ये तु भूतभाविन क्षणास्ते परिणामान्विता व्याख्येयाः। तेनैकेन क्षणेन कृत्स्नो लोकः परिणाममनुभवति। तत्क्षणोपारूढाः खल्वमी सर्वे धर्माः। तयोः क्षणतत्क्रमयोः संयमात्तयोः साक्षात्करणम्। ततश्च विवेकजं ज्ञानं प्रादुर्भवति॥५२॥

व्या० भा० अ० - जिस प्रकार छोटे से छोटा द्रव्य परमाणु (कहा जाता) है। इसी प्रकार छोटे से छोटा काल, क्षण (कहलाता) है अथवा जितने समय में चला हुआ परमाणु पूर्व देश को छोड़कर उत्तर देश को प्राप्त करे वह काल 'क्षण' (कहलाता) है। उन (क्षणों का) अविच्छिन्न प्रवाह 'क्रम' कहा जाता है। क्षण और उनके क्रम का वस्तुरूप में संग्रह नहीं (होता) है इसलिए मुहूर्त अहोरात्रादि बुद्धिगृहीत हैं। वह यह (बुद्धि के द्वारा गृहीत) अवास्तविक काल बुद्धि द्वारा निर्मित, शब्दज्ञान के पीछे चलनेवाला, लौकिक असमाहित जनों को वस्तु स्वरूप के समान प्रतीत होता है ।

'क्षण' तो वास्तविक एवं क्रम का आश्रय (होता है), और 'क्रम' क्षणों का अव्यवहित स्वरूप है। कालवेत्ता योगीजन उसको 'काल' ऐसा कहते हैं। दो क्षण एक साथ उपस्थित नहीं होते। और दो क्षणों का क्रम भी एक साथ नहीं होता, दो क्षणों का एक साथ उपस्थित होना, असंभवहोने से। पूर्व क्षण से उत्तर क्षण का जो व्यवधानरहित सम्बन्ध है, वह 'क्रम' है। इसलिए वर्तमान ही एक क्षण (होता) है पूर्व एवं उत्तर क्षण नहीं होते। इसलिए उसका संग्रह नहीं (होता) है। जो तो भूत और भावी क्षण हैं वे परिणाम में अन्वित कहे जाने चाहिए। उस एक (वर्तमान) क्षण के द्वारा समस्त लोक परिणाम का अनुभव करता है। वे धर्म उस क्षण पर आरूढ़ हैं। उन क्षण एवं उनके क्रमों में संयम से उन (क्षण एवं क्रमों) का साक्षात्कार होता है। उससे विवेकजन्य ज्ञान प्रादुर्भूत होता है॥५२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकज ज्ञान उत्पन्न होता है।

जैसे मिट्टी के ढेले का विभाग करते-करते अन्त में वह इतना सूक्ष्म हो जाय कि पुनः उसका विभाग न हो सके वह द्रव्य 'परमाणु' कहाता है। वैसे ही समय का विभाग करते जाने पर उसका जो सबसे छोटा भाग हो, वह क्षण (काल) है। अथवा जितने समय में चला हुआ परमाणु पूर्व देश को त्याग कर उत्तर देश को प्राप्त होता है, वह क्षण है। उन क्षणों का जो प्रवाह (नैरन्तर्य ) है तारतम्य है, उसका विच्छेद न होना 'क्रम' है। क्षण और क्षणों के अव्यवहित आनन्तर्य (क्रम) में वस्तु समाहार-वस्तु रूप में समुदाय नहीं है। मुहूर्त, दिन, रात्रि आदि जो स्थूल काल है, वह बौद्धिक दृष्टि से काल का समुदाय माना जाता है। वास्तव में वह काल और क्रम का समुदाय नहीं है। क्योंकि सभी क्षण और क्रम एक समय में एकत्रित नहीं हो सकते। उस क्षण काल का वस्तु समुदाय न होने पर भी अर्थात् अनेक क्षणों का वस्तु रूप में एक काल नहीं होता, फिर भी साधारण लोगों को वह वस्तु रूप में दिखाई देता है।

क्षण तो वस्तु कोटि में आता है और वह क्रम का आश्रय है। अर्थात् क्षण वास्तविक काल है। यदि क्षण को भी मुहूर्त आदि की भाँति काल्पनिक माना जाय तो क्रम का आश्रय कोई भी नहीं होगा। क्रम का यह अर्थ है कि वह क्षणों के आनन्तर्य रूप में रहता है अर्थात् क्षणों के साथ आबद्ध रहता है, क्षणों के आधीन रहता है। जो भूत एवं भावी क्षण हैं वे अतीत लक्षण परिणाम तथा अनागत लक्षण परिणाम में सामान्य रूप से अनुगत जानने चाहिए। एक ही क्षण से सम्पूर्ण लोक परिणाम का अनुभव करता है अर्थात् क्षण क्षण में परिवर्तन को प्राप्त होता है। सभी पदार्थ वर्तमान क्षण पर ही आरूढ़ रहते हैं अर्थात् क्षण काल से बाहर नहीं जा सकते। उन क्षणों तथा उनके क्रम में संयम करने से उनका साक्षात्कार होता है। उससे विवेकज ज्ञान की उत्पत्ति होती है।।

जब कोई भी वस्तु उत्पन्न होती है, तब वह नवीन दिखाई देती है। कालान्तर में वह पुरानी दिखाई देती है। प्रारम्भ में दृढ़ होती है, लम्बे काल के पश्चात् वह निर्बल हो जाती है। यदि बहुत अधिक काल तक उसको रखा जाय तो जीर्ण-शीर्ण हो जाती है। उसको हाथ से पकड़ कर उठाया जाए तो उसका चूर्ण हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उत्पन्न हुए घट, पट, पत्थरादि पदार्थ क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त होते रहते हैं। उनमें परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन तत्काल नहीं होता, धीरे धीरे होता है। इससे यह परिणाम निकलता है कि महत्तत्व से लेकर मानव शरीर पर्यन्त सभी पदार्थ क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त हो रहे हैं। कालान्तर में उन सबका विनाश हो जायेगा और जीवात्मा और परमात्मा, क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त नहीं होते, इसलिए वे विनाशरहित हैं। इससे यह भी लाभ होता है कि सांसारिक पदार्थों में व्यक्ति की आसक्ति नहीं होती और उन पदार्थों में स्व-स्वामी सम्बन्ध भी नहीं रहता। स्व स्वामी सम्बन्ध के न रहने से व्यक्ति का अभिमान नष्ट हो जाता है॥५२॥

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