इस सूत्र में यह बतलाया है कि विवेकख्याति से भी वैराग्य होने के कारण और दोष बीजों का नाश होने पर योगी को कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
क्लेशों और अशुभ तथा सकाम कर्मों के क्षीण हो जाने पर योगी ऐसा जानता है कि यह विवेकख्याति भी सत्त्वगुण का ही धर्म है। सत्त्व गुण को हेय कोटि में रखा गया है। अपरिणामी, शुद्ध पुरुष अर्थात् जीवात्मा सत्त्व से सर्वथा भिन्न है। इस प्रकार से विरक्त होते हुए योगी के अङ्कुरित होने में असमर्थ जले हुए धानों के बीजों के सदृश जो क्लेशों के बीज रहते हैं, वे क्लेशों के साथ-साथ ही प्रकृति में लीन हो जाते हैं। उनके लीन हो जाने पर जीवात्मा इन तीन प्रकार के दुःखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) को नहीं भोगता। तब मन में कर्म, क्लेश, विपाक के रूप से अभिव्यक्त एवं कृतकृत्य हुए गुणों के प्रकृति में लीन होने पर जीवात्मा का सत्त्वादि तीन गुणों से अत्यन्त वियोग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि जीवात्मा योगाभ्यास करते करते सम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति को प्राप्त करता है। इसकी प्राप्ति केवल जीवात्मा के सामर्थ्य से नहीं होती किन्तु ईश्वरप्रदत्त साधनों और ज्ञान से होती है। सम्प्रज्ञात समाधि की परिपक्व अवस्था में विवेकख्याति के दृढ़ हो जाने पर बुद्धि और जीवात्मा के पृथक्त्व का ज्ञान होता है। जब जीवात्मा विवेकख्याति में भी दोष देखता है तो उससे भी वैराग्य अर्थात् परवैराग्य हो जाता है। परवैराग्य और ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से असम्प्रज्ञात समाधि होती है। उससे जीवात्मा को अपने स्वरूप का और ईश्वर के स्वरूप का परिज्ञान होता है। इस अवस्था में आत्मा मुक्ति का अधिकारी बन जाता है और ईश्वर उसको मोक्ष प्रदान करता है। इस स्थिति में जीवात्मा के शरीर आदि प्रकृति से बने उपकरण उसी में लीन हो जाते हैं। जीवात्मा के केवल अपने स्वरूप में स्थित होने से मोक्ष नहीं होता। किन्तु ईश्वरसाक्षात्कार से ही होता है। ईश्वरसाक्षात्कार से अविद्या आदि क्लेशों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति होती है॥५०॥