इस सूत्र में संयम की सिद्धि का फल बतलाया है। धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों का अभ्यास करते-करते जब परिपक्व अवस्था आ जाती है तब बुद्धि का विशेष विकास होता है।
(१) जब यम, नियम आदि अङ्गों का पालन करते हुए धारणा, ध्यान, समाधि का अभ्यास किया जाता है तब रजोगुण, तमोगुण निर्बल हो जाते हैं और सत्त्वगुण प्रबल हो जाता है। सत्त्व गुण के प्रबल होने बुद्धि का विकास होता हैं, कुसंस्कार निर्बल हो जाते है और सुसंस्कार प्रबल हो जाते हैं।
(२) वैशेषिककार महर्षि कणाद जी ने संस्कार दोष से अविद्या की उत्पत्ति बतलाई है। इन्द्रियदोषात् संस्कारदोषाच्चाविद्या॥वैशेषिक ९/२/१० इससे अर्थापत्ति से यह सिद्ध होता है कि सुसंस्कार से विद्या उत्पन्न होती है।
(३) यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि ईश्वर भी उपासकों को विद्या प्रदान करता है। उससे ज्ञान की वृद्धि होती है। जो लोग यह मानते हैं कि ज्ञान का विकास स्वयं हो जाता है ज्ञानदाता ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है उनकी यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि ज्ञान बिना ज्ञाता के नहीं रह सकता। इसलिए ज्ञान का आधार ईश्वर है और उसके द्वारा प्रदत्त ज्ञान से ही जीवात्मा सफल होता है। वेद में ईश्वर ने कहा है कि -
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥ऋ० १०।१२५।५।।
भावार्थ - मैं जिस-जिस को चाहता हूँ उस-उस को बलवान् करता हूँ और जिसको चाहता उसको ब्रह्मा (चतुर्वेदवित्) बनाता हूँ और जिसको चाहता हूँ उसको ऋषि और जिसको चाहता उसको उत्तमबुद्धि से युक्त करता हूँ। इसलिये प्रज्ञा लोक की सिद्धि होती है।
तं सुमेधाम्.....यहाँ पर इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जो व्यक्ति ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है और उसकी उपासना करता है उसको ईश्वर मेधावी बना देता है। सब को नहीं बनाता तथा स्वेच्छा से वा बिना पुरुषार्थ किये भी किसी को नही बनाता॥५॥