इस सूत्र में यह बतलाया है कि बुद्धि और आत्मा को पृथक्-पृथक् जानने वाले योगी को दो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। रजोगुण, तमोगुण के मलों से बुद्धि के अत्यन्त शुद्ध हो जाने पर उत्कृष्ट वैराग्य की प्राप्ति होने पर, बुद्धि और पुरुषान्यताख्याति रूप में प्रतिष्ठित योगी को 'सर्वभावाधिष्ठातृत्व' और 'सर्वज्ञातृत्व' सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
पहली सिद्धि 'सर्वभावाधिष्ठातृत्व' है - इसका अर्थ यह है कि योगी के अपने से सम्बद्ध जो पदार्थ हैं, जैसे बुद्धि अहंकार मन, इन्द्रियाँ, शरीरादि। इन सब पदार्थों का योगी अधिष्ठाता बन जाता है अर्थात् इन सबको अपने वश में रखकर धर्म मार्ग पर चलाता है। कुछ बाहर के पदार्थों को जैसे कि पृथिवी, जलादि एवं उनसे बने पदार्थों को अपने अधिकार में रख कर योगी संसार के कल्याण के लिए उनका उचित प्रयोग कर सकता है। जन समुदाय को भी अपने अधिकार में रख कर उसे मोक्षमार्ग पर चला सकता है। परन्तु वह प्रकृति, विकृति, लोक-लोकान्तर आदि समस्त पदार्थों का अधिष्ठाता नहीं बन सकता। उनका अधिष्ठाता तो केवल ईश्वर ही है। क्योंकि वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ है।
दूसरी सिद्धि 'सर्वज्ञातृत्व' है - सत्त्वादि तीन गुणों से उत्पन्न एवं भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल में विद्यमान पदार्थों का योगी ज्ञाता बन जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि तीनों कालों में जो पदार्थ विद्यमान रहते हैं उनमें से अनेक पदार्थों का विशेष ज्ञान योगी को प्राप्त होता है।
अन्य लोगों की अपेक्षा योगी को अधिक ज्ञान होता है। परन्तु सम्पूर्ण पदार्थों का ज्ञान योगी को नहीं हो सकता क्योंकि योगी एकदेशी है। समस्त पदार्थों का पूर्णज्ञान तो केवल ईश्वर को ही हो सकता है। क्योंकि ईश्वर चेतन व सर्वव्यापक है। योगी को सर्वज्ञ इसलिए कहा जाता है कि वह मोक्ष के लिए जितना ज्ञान अपेक्षित है उस सबको प्राप्त कर लेता है। योगी के इस ज्ञान को 'विवेकज ज्ञान' कहते हैं। यह 'विशोका' नाम की सिद्धि है। जिसको प्राप्त करके योगी सर्वज्ञ, क्षीणक्लेशबन्धन वाला होकर स्वतंत्र विचरता है॥४९॥