इस सूत्र में अणिमादि सिद्धि, कायसम्पत् और भूतों के धर्मों के आघात का निषेध किया है। इस सूत्र के व्यासभाष्य में अणिमादि आठ सिद्धियों के विषय में लिखा है और कुछ अन्य सिद्धियों के विषय में भी लिखा है।
यहाँ पर उन सिद्धियों पर विचार किया जाता है।
अणिमादि सिद्धियों के विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के विचार -
"इसमें द्रष्टा से अभिप्राय ईश्वर है। योगी विभूति को शुद्ध करता है यह योगशास्त्र में लिखा है। अणिमा आदि विभूतियाँ हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग जो यह मानते हैं कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है। अणिमा का अर्थ यह है कि (योगी का चित्त) छोटी से छोटी वस्तु को विशेष सूक्ष्म होकर नापने वाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषतर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है, उसे गरिमा कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है।" उपदेशमञ्जरी ११ वाँ प्रवचन, पृष्ठ ११७
अणिमादि आठ सिद्धियाँ
१. अणिमा - शरीर को अणु बना लेना यदि पतले शरीर को अणु माना जाता है, तो ठीक है। परन्तु शरीर को चींटी जैसा अथवा परमाणु जैसा बनाना माना जाता है, तो यह सम्भव नहीं।
२. लघिमा - शरीर को कुछ हलका बनाना माना जाता है, तो ठीक है। परन्तु विमान की भाँति आकाश में उड़ना माना जाता है, तो यह परीक्षा कोटि में है।
३. महिमा - शरीर बलवान् व्यक्तियों की भाँति लम्बा चौड़ा बना लिया जाता है तो ठीक है। परन्तु हिमालय पर्वत जैसा माना जाता है, तो सम्भव नहीं है।
४. प्राप्ति - चन्द्रमा को मानसिक कल्पना से अंगुलि के अग्रभाग से छूना माना जाता है, तो ठीक है और यदि स्थूल शरीर की अंगुलि से चन्द्रमा को छूना माना जाता है, तो यह सम्भव नहीं है।
५. प्राकाम्य - इच्छा का विघात न होना। योगी चित्त को वश में करने की इच्छा करे अथवा ईश्वरसाक्षात्कार की इच्छा करे तो प्रयत्न करने पर पूर्ण हो सकती है। यदि योगी यह इच्छा करे कि मैं स्थूलशरीर से शिला में प्रवेश कर जाऊँ और पश्चात् जैसा का तैसा बाहर निकल आऊँ, यह सम्भव नहीं है।
६. वशित्व - पृथिवी आदि कुछ भूतों और उनसे उत्पन्न कुछ पदार्थों को वश में कर लेना तो सम्भव है। जैसे आजकल के वैज्ञानिक कुछ मात्रा में स्थूल भूतों और उनसे बने पदार्थों को वश में कर लेते हैं। वैसे ही योगी भी कर सकता है। परन्तु सभी भूतों और सभी पदार्थों को वश में कर लेना सम्भव नहीं है।
७. ईशितृत्व - भूमि आदि से बने कुछ पदार्थों को लेकर नये पदार्थ उत्पन्न कर देना और उनका नाश कर देना तथा उनको जिस स्थिति में रखना चाहे उसी स्थिति में रखना ऐसा वशित्व योगी कर सकता है। परन्तु प्रकृति अथवा परमाणुओं को लेकर नई सृष्टि बना देना, उसका विनाश कर देना, समस्त सृष्टि के पदार्थों को व्यवस्थित कर देना सम्भव नहीं है।
८. यत्रकामावसायित्व - सत्यसङ्कल्प जो कार्य योगी के ज्ञान, बल से किये जा सकते हैं, उनको उत्पन्न करने की इच्छा करना, उनको बनाने का प्रयास करना, ऐसी स्थिति में उनकी उत्पत्ति हो सकती है और विनाश भी हो सकता है। परन्तु इच्छा मात्र से नये पदार्थों की उत्पत्ति और विनाश नहीं हो सकता।
इसी सूत्र के भाष्य में आई कुछ अन्य सिद्धियों पर विचार :-
'तद्धर्मानभिघात' भूमि योगी के स्थूल शरीर की गति को नहीं रोकती अर्थात् भूमि में स्थूल शरीर से योगी प्रवेश कर जाता है, यह सम्भव नहीं है। यदि बुद्धि से योगी भूमि में प्रवेश करता है तो यह परीक्षा कोटि में है। इसी प्रकार योगी का स्थूल शरीर से पत्थर में प्रवेश करने की बात को समझ लेवें। यदि योगी के शरीर को जल नहीं गलाता है, अग्नि नहीं जलाती है ऐसा माना जाता है तो यह सम्भव नहीं है। योगी का शरीर जल की शीतलता को अग्नि की उष्णता को किसी सीमा तक अयोगी लोगों की अपेक्षा अधिक सह लेता है, ऐसा माना जाये तो यह ठीक है॥४५॥