तत्र पार्थिवाद्याः शब्दादयो विशेषाः सहकारादिभिर्धर्मैः स्थूलशब्देन परिभाषिताः। एतद्भूतानां प्रथमं रूपम्। द्वितीय रूपं स्वसामान्यं मूर्तिर्भूमिः स्नेहो जलं वह्निरुष्णता वायुः प्रणामी सर्वतोगतिराकाश इत्येतत्स्वरूपशब्देनोच्यते। अस्य सामान्यस्य शब्दादयो विशेषाः। तथा चोक्तम्एकजातिसमन्वितानामेषां धर्ममात्रव्यावृत्तिरिति।
सामान्यविशेषसमुदायोऽत्र द्रव्यम्। द्विष्ठो हि समूहः। प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगतः-शरीरं वृक्षो यूथं वनमिति। शब्देनोपात्तभेदावयवानुगतः समूहः- उभये देवमनुष्याः, समूहस्य देवा एको भागो मनुष्या द्वितीयो भागः। ताभ्यामेवाभिधीयते समूहः। स च भेदाभेदविवक्षितः। आम्राणां वनं ब्राह्मणानां सङ्घः, आम्रवणं ब्राह्मणसङ्घ इति।
स पुनर्द्विविधो युतसिद्धावयवोऽयुतसिद्धावयवश्च। युतसिद्धावयवः समूहोवनं सङ्घ इति। अयुतसिद्धावयवः सङ्घातः - शरीरं वृक्षः परमाणुरिति। अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहो द्रव्यमिति पतञ्जलिः। एतत्स्वरूपमित्युक्तम्।
अथ किमेषां सूक्ष्मरूपम् ? तन्मात्रं भूतकारणम्। तस्यैकोऽवयवः परमाणुः सामान्यविशेषात्माऽयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समुदाय इत्येवं सर्वतन्मात्राण्येतत्तृतीयम्। अथ भूतानां चतुर्थं रूपं ख्यातिक्रियास्थितिशीला गुणाः कार्यस्वभावानुपातिनोऽन्वयशब्देनोक्ताः। अथैषां पञ्चमं रूपमर्थवत्त्वम्, भोगापवर्गार्थता गुणेष्वन्वयिनी, गुणास्तन्मात्रभूतभौतिकेष्विति सर्वमर्थवत्।
तेष्विदानीं भूतेषु पञ्चसु पञ्चरूपेषु संयमात्तस्य तस्य रूपस्य स्वरूपदर्शनं जयश्च प्रादुर्भवति। तत्र पञ्च भूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयी भवति। तज्जयाद्वत्सानुसारिण्य इव गावोऽस्य सङ्कल्पानुविधायिन्यो भूतप्रकृतयो भवन्ति॥४४॥
व्या० भा० अ० - उनमें पृथिवी आदि में रहने वाले आकारादि धर्मों सहित शब्दादि विशेष 'स्थूल' शब्द के द्वारा कहे गए हैं। यह भूतों का प्रथम रूप है। द्वितीय रूप (उनका) अपना सामान्य है। कठोरता भूमि (का अपना सामान्य धर्म है), स्नेह जल का (सामान्य धर्म है), उष्णता वह्नि (अग्नि का) धर्म है, प्रणामी वहनशील वायु है, सर्वत्र व्यापनशील आकाश है यह 'स्वरूप' शब्द से कहा जाता है। इस सामान्य के शब्दादि विशेष हैं। और इसी प्रकार कहा गया है. एक एक सामान्य स्वरूप वाले इन भूतों की धर्ममात्र से पृथक्ता है।
सामान्यविशेषों का समुदाय इस (शास्त्र) में 'द्रव्य' माना गया है। समूह दो प्रकार का है। (प्रथम) जिनका भेद शब्दों से अप्रकटित है, ऐसे अवयवों में अनुगत समूह। (जैसे कि) - शरीर, वृक्ष, यूथ (झुण्ड) वन। (द्वितीय) जिनका भेद शब्दों से प्रकटित है, ऐसे अवयवों में अनुगत (समूह) जैसे देवों और मनुष्यों का समूह। समूह का एक भाग देव, दूसरा भाग मनुष्य, उन दोनों के द्वारा ही समूह कहा जाता है। वह (समूह) विवक्षित भेद वाला और अविवक्षित भेदवाला (होता है) उदाहरण:- आम्रों का वन, ब्राह्मणों का सङ्घ, आम्रवन, ब्राह्मणसङ्घ।
वह (प्रथम समूह) फिर दो प्रकार का है। पृथक् करने योग्य अवयवयुक्त और पृथक् न करने योग्य अवयवों वाला। पृथक् करने योग्य अवयवों वाला समूह (उदाहरण के लिए) वन, सङ्घ। पृथक् न करने योग्य अवयवों वाला समूह (उदाहरण के लिए) शरीर, वृक्ष, परमाणु। पृथक् न करने योग्य अवयवों में अनुगत समूह द्रव्य है ऐसा पतञ्जलि (आचार्य) मानते हैं। यह स्वरूप कहा गया है।
इसके आगे (प्रश्न है कि) इनका सूक्ष्मरूप क्या है ? भूत का कारण तन्मात्र (इसका सूक्ष्मरूप है), उस (भूत) का एक अवयव परमाणु (है यह) सामान्य विशेषात्मक, पृथक् न करने योग्य अवयव भेदों में अनुगत (अतः) समूह (द्रव्य) है, इस प्रकार सभी तन्मात्रायें, यह तृतीयरूप है। इसके आगे भूतों का चतुर्थरूप - प्रख्या, प्रवृत्ति, स्थिति स्वभाव वाले अपने कार्यों के स्वभाव में अनुगत रहने वाले गुण 'अन्वय' शब्द के द्वारा कहे गये हैं। इसके आगे इन भूतों का पञ्चमरूप 'अर्थवत्त्व' गुणों में अनुगत रहने वाली (इनकी) भोगापवर्गता। गुण तन्मात्राओं, भूत एवं भूतों से बने भौतिक पदार्थों में (अनुगत है) इसलिये ये सब अर्थवत् हैं।
उनमें से अब पञ्चभूतों में उनमें विद्यमान पाँच रूपों में संयम करने से योगी को उस उस रूप का स्वरूपदर्शन और जय उत्पन्न होता है। उसमें से भूतों के पाँच रूपों को जीतकर योगी 'भूतजयी' होता है। उस जय से बछड़ों का अनुगमन करने वाली गौओं के समान भूत प्रकृतियाँ इस योगी के सङ्कल्प का अनुसरण करने वाली होती हैं॥४४॥