Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 43

3/43
Sutra
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा. ततः प्रकाशावरणक्षयः ।। ३.४३ ।।

Bhashya

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Word Meaning

बहिरकल्पितावृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥४३॥

शब्दार्थ - (बहिः-अकल्पिता-वृत्तिः-महाविदेहा) शरीर से सम्बद्ध मन का जो बाहर के पदार्थों से वृत्ति लाभ होता है उस अकल्पिता वृत्ति का नाम महाविदेहा है। (ततः) उससे (प्रकाश-आवरण-क्षयः) प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है।

सूत्रार्थ - शरीर से सम्बद्ध रहते हुए मन का जो बाहर के पदार्थों से वृत्तिलाभ है, वह महाविदेहा नामक धारणा है उससे बुद्धि सत्त्व का जो आवरण = रजस्तमोमूलक क्लेश-कर्मविपाक-त्रय है, उसका विनाश होता है।

Vyas Bhashya

शरीराद्बहिर्मनसो वृत्तिलाभो विदेहा नाम धारणा।

सा यदि शरीरप्रतिष्ठस्य मनसो बहिर्वृत्तिमात्रेण भवति सा कल्पितेत्युच्यते। या तु शरीरनिरपेक्षा बहिर्भूतस्यैव मनसो बहिर्वृत्तिः, सा खल्वकल्पिता। तत्र कल्पितया साधयन्त्यकल्पितां महाविदेहामिति, यया परशरीराण्याविशन्ति योगिनः। ततश्च धारणातः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य यदावरणं क्लेशकर्मविपाकत्रयं रजस्तमोमूलं तस्य च क्षयो भवति॥४३॥

व्या० भा० अ० - शरीर से बाहर (के किसी पदार्थ में) मन की वृत्ति 'विदेहा' नामक धारणा है। वह (धारणा) यदि शरीर में स्थित मन की बाह्य ( पदार्थ में) वृत्तिमात्र से होती है (तो वह) कल्पिता कही जाती है। जो तो शरीराभिमानरहित बहिर्भूत मन की बाह्यवृत्ति अकल्पिता कहलाती है। (योगी) उन दोनों में से कल्पिता के द्वारा अकल्पिता नामक महाविदेहा को सिद्ध करते हैं, जिससे (वृत्तिमात्र से) परशरीरों में आविष्ट हो जाते हैं। उस धारणा से रजस्-तमस् के कारण प्रकाशात्मा बुद्धि का जो क्लेश कर्म और त्रिविध विपाकात्मक आवरण है, उसका क्षय होता है।। ४३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में महाविदेहावृत्ति का स्वरूप और उसका फल बतलाया है।शरीर के बाहर मन की वृत्ति का होना विदेहा नाम की धारणा है। शरीर में मन के रहते हुए यदि केवल वृत्ति के द्वारा होती है तो वह कल्पिता कहाती है। योगी कल्पिता के द्वारा अकल्पिता महाविदेहा को सिद्ध करते हैं। उससे परशरीरों में प्रवेश करते हैं। उस धारणा से प्रकाशात्मक बुद्धिसत्त्व का जो रजोगुण-तमोगुण-जन्य आवरण = क्लेश-कर्म-विपाक है, वह नष्ट होता है। मन के शरीर में रहते हुए जो संकल्पमात्र से बाहर के पदार्थों में धारणा की जाती है, वह कल्पिता धारणा है। जो शरीर में मन के रहते हुए शरीर के अभिमान से रहित होकर बाहर के पदार्थों में उसका सम्बन्ध करके धारणा की जाती है, वह अकल्पिता धारणा है।

यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि शरीर में मन के रहते हुए बाहर के पदार्थों में धारणा की जाती है अथवा मन को शरीर से नितान्त बाहर निकाल कर बाहर के पदार्थों में धारणा की जाती है। वास्तविकता यह है कि मन को शरीर से नितान्त बाहर निकाल कर यह धारणा नहीं की जाती। किन्तु शरीर में मन के रहते हुए बाहर के पदार्थों से उसका सम्बन्ध करके धारणा की जाती है। कहीं पर इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध करके बाहर के पदार्थों में धारणा की जाती है और कहीं बिना इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध किये की जाती है। यदि मन को शरीर से नितान्त बाहर निकाल दिया जाय तो वह कार्य करना छोड़ देवेगा। यदि केवल मन को शरीर से बाहर निकाल कर उससे धारणा की जायेगी और योगी शरीर में रहेगा, तो केवल मन से बाहर के पदार्थों में धारणा नहीं की जा सकेगी। इसलिये शरीर में मन के रहते हुए उसका बाहर के पदार्थों से सम्बन्ध करके योगी इस धारणा की सिद्धि करता है। योगी परशरीर में प्रवेश नहीं करता है। इस विषय में 'योगदर्शन ३/३८' पर लिख दिया है। वहाँ पर देख लेवें॥४३॥

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