इस सूत्र में उदान (प्राण) जय का फल बतलाया है। बाह्यकरण नेत्र आदि इन्द्रियाँ और अन्तःकरण बुद्धि, अहंकार, मन ये दोनों प्रकार के कारण और प्राण जो मिलकर व्यापार करते हैं, वह जीवन है। इस जीवन के व्यापार में प्राणों का स्थान और उनके कार्यों को जानना आवश्यक है। इनमें प्राण मुख्य है। क्योंकि ये सब उसी के भेद हैं। मुख और नासिका के द्वारा गति करने वाला, नासिका के अग्रभाग से लेकर हृदय पर्यन्त रहने वाला, श्वासप्रश्वास आदि जिसका कार्य है, वह प्राण है। नीचे को गति करने वाला, मल मूत्र आदि को बाहर निकालने वाला, नाभि से लेकर पैरों के तलभाग तक रहने वाला अपान है। खान पान के रस को पहुँचाने वाला और हृदय से लेकर नाभि तक रहने वाला समान है। जो सम्पूर्ण शरीर में व्यापक होकर रक्त सञ्चार और विभिन्न चेष्टाओं को करने में सहायता करने वाला है, वह व्यान है। जो ऊपर की ओर ले जाने के कार्यों को करता है, कण्ठ से लेकर मूर्द्धा तक रहता है, वह उदान है।
उदान प्राण को जीत लेने पर योगी जल में नहीं डूबता, उसके शरीर में काँटें नहीं चुभते, कीचड़ में पैर नहीं धंसते और मृत्यु के पश्चात् उसकी ऊँची गति होती है। योगी पानी पर भूमि की भाँति चलता है, डूबता नहीं। यह अभी साध्य कोटि में है। हलका होने से तथा सावधानी से चलने से योगी के शरीर में काँटें कम चुभें, यह तो हो सकता है। परन्तु नितान्त कांटे न चुभें, यह साध्य है। कठोर कीचड़ में योगी का शरीर कम धंसे, यह तो हो सकता है। परन्तु नितान्त न धंसे, यह बात सिद्ध नहीं है। पूर्वोक्त उदान जय आदि योगाभ्यास से योगी की ऊँची गति होती है।। ३९।।