Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 39

3/39
Sutra
उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ।। ३.३९ ।।

Bhashya

1 Available
Word Meaning

उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च॥३९॥

शब्दार्थ - (उदान-जयात्) उदान के जीतने से (जल-पङ्क-कण्टक-आदिषु-असङ्गःउत्क्रान्ति:-च) जल, पङ्क, कण्टकादि में असङ्ग रहता है और ऊर्ध्वगति होती है। 

सूत्रार्थ - उदान की जीतने से जल, पङ्क, काँटें आदि से सङ्ग नहीं होता अर्थात् जलादि में योगी का शरीर नहीं डूबता, योगी के शरीर में काँटें आदि नहीं चुभते और मृत्यु के पश्चात् वह योगी ऊँची गति को प्राप्त करता है।

Vyas Bhashya

समस्तेन्द्रियवृत्तिः प्राणादिलक्षणा जीवनम्। तस्य क्रिया पञ्चतयी-प्राणो मुखनासिकागतिराहृदयवृत्तिः। समं नयनात्समानश्चानाभिवृत्तिः। अपनयनादपान आपादतलवृत्तिः। उन्नयनादुदान आशिरोवृत्तिः। व्यापी व्यान इति। एषां प्रधानं प्राणः। उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च प्रायणकाले भवति, तां वशित्वेन प्रतिपद्यते॥३९॥

व्या० भा० अ० - प्राणादि लक्षणों वा सब इन्द्रियों का (सामान्य) व्यापार 'जीवन' है। उसकी क्रिया पाँच प्रकार की है। मुख तथा नासिका के द्वारा गमन करने वाला हृदय पर्यन्त रहने वाला'प्राण' है। (खाये पीये अन्न रस) को समान रूप से ले जाने के कारण 'समान' कहा जाता है (यह हृदय से लेकर) नाभि पर्यन्त रहता है। (मल, मूत्र, गर्भ आदि को) नीचे ले जाने के कारण 'अपान' कहलाता है (जो नाभि से लेकर) पैरों के तलुए तक रहता है। (नासिका के अग्र भाग से) ऊपर ले जाने के कारण 'उदान' कहाता है (जो नासिका के अग्रभाग से लेकर) शिर तक रहता है। (समस्त शरीर में) व्याप्त रहने से 'व्यान' कहा जाता है। उनमें से प्राण मुख्य है। उदान जय से जल, कीचड़, काँटें आदि में सङ्ग नहीं होता और मरण काल में (योगी की) ऊर्ध्व गति होती है। उस (ऊर्ध्व गति) को स्वाधीन कर लेता है॥३९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में उदान (प्राण) जय का फल बतलाया है। बाह्यकरण नेत्र आदि इन्द्रियाँ और अन्तःकरण बुद्धि, अहंकार, मन ये दोनों प्रकार के कारण और प्राण जो मिलकर व्यापार करते हैं, वह जीवन है। इस जीवन के व्यापार में प्राणों का स्थान और उनके कार्यों को जानना आवश्यक है। इनमें प्राण मुख्य है। क्योंकि ये सब उसी के भेद हैं। मुख और नासिका के द्वारा गति करने वाला, नासिका के अग्रभाग से लेकर हृदय पर्यन्त रहने वाला, श्वासप्रश्वास आदि जिसका कार्य है, वह प्राण है। नीचे को गति करने वाला, मल मूत्र आदि को बाहर निकालने वाला, नाभि से लेकर पैरों के तलभाग तक रहने वाला अपान है। खान पान के रस को पहुँचाने वाला और हृदय से लेकर नाभि तक रहने वाला समान है। जो सम्पूर्ण शरीर में व्यापक होकर रक्त सञ्चार और विभिन्न चेष्टाओं को करने में सहायता करने वाला है, वह व्यान है। जो ऊपर की ओर ले जाने के कार्यों को करता है, कण्ठ से लेकर मूर्द्धा तक रहता है, वह उदान है।

उदान प्राण को जीत लेने पर योगी जल में नहीं डूबता, उसके शरीर में काँटें नहीं चुभते, कीचड़ में पैर नहीं धंसते और मृत्यु के पश्चात् उसकी ऊँची गति होती है। योगी पानी पर भूमि की भाँति चलता है, डूबता नहीं। यह अभी साध्य कोटि में है। हलका होने से तथा सावधानी से चलने से योगी के शरीर में काँटें कम चुभें, यह तो हो सकता है। परन्तु नितान्त कांटे न चुभें, यह साध्य है। कठोर कीचड़ में योगी का शरीर कम धंसे, यह तो हो सकता है। परन्तु नितान्त न धंसे, यह बात सिद्ध नहीं है। पूर्वोक्त उदान जय आदि योगाभ्यास से योगी की ऊँची गति होती है।। ३९।।

All Sutras