इस सूत्र में पूर्व सूत्रोक्त छः सिद्धियाँ समाधि में बाधक और व्युत्थान अवस्था में सिद्धियाँ बतलाई हैं।
प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्ता, व्युत्थान अवस्था में तो सिद्धियाँ हैं। परन्तु समाधि प्राप्ति में अर्थात् जिस समाधि में जीवात्मा और परमात्मा का साक्षात्कार होता है उस सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि में विघ्न हैं। योगाभ्यासी जब इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है तब उसके मन में लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा, ये उभर सकती हैं। इन सिद्धियों के द्वारा वह इन एषणाओं की पूर्ति में रत हो सकता है। इसलिए इनको समाधि प्राप्ति में बाधक माना है। इन एषणाओं को बीजसहित हटा देना अर्थात् निर्मूल कर देना अत्यन्त परिश्रम साध्य है। परन्तु असंभव नहीं है।
जब व्यक्ति को किसी कार्य में सफलता मिलती है तब वह उस कार्य का लौकिक फल प्राप्त करना चाहता है। यह सकाम कर्म की स्थिति है। सिद्धियों की प्राप्ति होने पर भी व्यक्ति उनका लौकिक फल- धन, सम्पत्ति, इन्द्रियों के भोग, सम्मान, पुत्र वा शिष्य की प्राप्ति का इच्छुक बन सकता है। यद्यपि लौकिक दृष्टि से उसको सफलता मिली है। परन्तु ये सिद्धियाँ समाधि प्राप्ति में बाधक हो जाती हैं। योगाभ्यासी को ऐसी सिद्धियों का परित्याग कर देना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार की सिद्धियों से स्व-स्वामी सम्बन्ध हो सकता है और उससे अभिमान उत्पन्न होता है। जो साधक समस्त पदार्थों का स्वामी ईश्वर को मान लेता है और उन पर से अपना स्वामित्व छोड़ देता है तो इस प्रकार की सिद्धियाँ समाधि प्राप्ति में बाधक नहीं होती॥३७॥