इस सूत्र में यह बतलाया गया है कि स्वार्थ में संयम करने से प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्ता छः सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं।
यहाँ विचारणीय है कि स्वार्थ में संयम करने से ये सिद्धियाँ होती हैं या पुरुष ज्ञान से होती हैं। 'प्रातिभ सिद्धि' से सूक्ष्म, व्यवहित विप्रकृष्ट ज्ञान की उत्पत्ति मानी है। इस विषय में “प्रवृत्त्यालोकन्यासात्॰” ३/२५॥सूत्र में लिखा है, वहाँ देख लेवें। 'श्रावण सिद्धि' से सूक्ष्म और दिव्य (उत्तम) शब्द सुनाई देता है। 'वेदना सिद्धि' से सूक्ष्म और दिव्य स्पर्श का अनुभव होता है। 'आदर्श सिद्धि' से सूक्ष्म और दिव्य रूप दिखाई देता है। 'आस्वाद सिद्धि' से सूक्ष्म और दिव्य रस का अनुभव होता है। 'वार्ता सिद्धि' से सूक्ष्म और दिव्य गन्ध का अनुभव होता है। प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्ता ये सिद्धियों के नाम हैं। श्रोत्रेन्द्रिय में सूक्ष्म शब्द सुनने की योग्यता, त्वगिन्द्रिय में सूक्ष्म स्पर्श करने की योग्यता, नेत्रेन्द्रिय में सूक्ष्मरूप देखने की योग्यता, रसना इन्द्रिय में सूक्ष्म रस जानने की योग्यता और घ्राण इन्द्रिय में सूक्ष्म गन्ध जानने की योग्यता उत्पन्न होती है।
'प्रातिभाद्वा सर्वम्' ३३वें सूत्र में सूत्र के द्वारा प्रातिभ ज्ञान का फल बतलाया है। वर्त्तमान सूत्र में प्रातिभज्ञान की उत्पत्ति स्वार्थ संयम से बतलाई है। भाष्य में दोनों स्थानों पर भिन्न-भिन्न फल बतलाये हैं। सूत्र ३०, ३१, ३२ और ३४ में तो कण्ठकूपादि स्थानों में संयम करने का फल बतलाया है किन्तु ३३वें सूत्र में किसमें संयम करने से प्रातिभ की सिद्धि होती है यह नहीं बताया गया है। इस सूत्र में श्रावणादि सिद्धियों के सन्दर्भ में प्रातिभ का नाम आया है। ऐसा क्यों लिखा गया है, यह अन्वेषणीय है॥३६॥