बुद्धिसत्त्वं प्रख्याशीलं समानसत्त्वोपनिबन्धने रजस्तमसी वशीकृत्य सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययेन परिणतम्। तस्माच्च सत्त्वात्परिणामिनो ऽत्यन्तविधर्मा विशुद्धोऽन्यश्चितिमात्ररूपः पुरुषः। तयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोग: पुरुषस्य दर्शितविषयत्वात्। स भोगप्रत्ययः सत्त्वस्य परार्थत्वाद् दृश्यः। '
यस्तु तस्माद्विशिष्टश्चितिमात्ररूपोऽन्यः पौरुषेयः प्रत्ययस्तत्र संयमात्पुरुषविषया प्रज्ञा जायते। न च पुरुषप्रत्ययेन बुद्धिसत्त्वात्मना पुरुषो दृश्यते, पुरुष एव तं प्रत्ययं स्वात्मावलम्बनं पश्यति। तथा ह्युक्तम्विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृहदारण्य उपनिषद् २/४/१४) इति॥३५॥
व्या० भा० अ० - प्रकाश-स्वभाव बुद्धि अविनाभाव सम्बन्ध से सत्त्व के साथ सम्बद्ध रहने वाले रजोगुण, तमोगुण को अभिभूत करके सत्त्वपुरुष अन्यताख्याति (बुद्धि और पुरुष भिन्न भिन्न हैं इस ज्ञान) के रूप में (अर्थात् विवेकख्याति की दशा में) परिणत होती है। उस परिणामी सत्त्व से अत्यन्त विरुद्ध धर्मवाला विशुद्ध (त्रिगुणात्तीत ) केवल चेतनस्वरूप पुरुष भिन्न है। अत्यन्त भिन्न उन (बुद्धि, पुरुषों) का अभिन्न (एकाकार) रूप से भासित होना पुरुष का भोग है। इसलिए कि पुरुष दर्शित विषय (बुद्धि के द्वारा दिखाए गए विषयों का प्रतिसंवेदी) होता है। वह भोग (नामक) ज्ञान बुद्धि के परार्थ होने के कारण (पुरुष का) दृश्य है।
उस भोग ज्ञान से विशिष्ट केवल चेतनस्वरूप पुरुष विषयक जो अन्य ज्ञान है, उसमें संयम करने से पुरुष विषयक ज्ञान होता है। बुद्धि के धर्मरूप पुरुष विषयक ज्ञान के द्वारा पुरुष नहीं देखा जाता है। पुरुष ही उस ज्ञान को अपने में आश्रित देखता है। ऐसा ही (बृहदारण्यक उपनिषद् २/४/१४ में) कहा है अरे ! विज्ञाता को किसके द्वारा जाना जाये।। ३५॥