इस सूत्र में हृदय में संयम करने का फल बतलाया है। शरीर के हृदय देश में चित्त रहता है। उसमें संयम करने से चित्त का ज्ञान हो जाता है। उससे योगी को चित्त जड़ है, यह ज्ञान हो जाता है। और अपने चित्त में कैसी कैसी वृत्तियाँ हैं ? कैसे संस्कार हैं ? प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार क्लेश कब किस प्रकार से रहते हैं ? क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध ये पाँच अवस्थाएँ कैसे उत्पन्न होती हैं ? चित्त को विक्षिप्त आदि अवस्थाओं से हटाकर एकाग्र अवस्था में ले जाते समय क्या क्या कठिनाई होती हैं ? आदि विषयों का ज्ञान होता है।
इस सूत्र के व्यासभाष्य में हृदय के सम्बन्ध में छान्दोग्योपनिषद् ८/१/१ के वाक्य से कुछ मिलता जुलता विवरण है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपनिषद् के इस वाक्य की आर्यभाषा में व्याख्या की है। उसमें हृदय के स्वरूप एवं स्थान का भी स्पष्टीकरण हो गया है। उसको यहाँ अविकलरूप से दिया जाता है।
अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति।.... कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में, और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिलता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है॥३॥ - ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपासना विषय॥३४॥