इस सूत्र में मूर्धा के सात्त्विक प्रकाश में संयम करने का फल बतलाया है। मूर्धा के सात्त्विक प्रकाश में संयम करने से सिद्धों का दर्शन होता है। योगाभ्यास करने से साधक की बुद्धि सात्त्विक हो जाती है। सत्संग, स्वाध्याय, ईश्वरोपासना करने से योगी में सत्त्वगुण प्रधान हो जाता है और रजोगुण, तमोगुण गौण हो जाते हैं। उससे व्यक्ति विवेक-वैराग्य का विकास करता है और ईश्वरोपासना श्रद्धापूर्वक करता है। व्यवहार में मन, वाणी, शरीर से यम-नियमों का पालन करता है तथा सात्त्विक भोजन करता है। ऐसे अनुष्ठानों के करने से जो सात्त्विक बुद्धि उत्पन्न होती है और ईश्वर की ओर से जो ज्ञान प्राप्त होता है, मेरी दृष्टि में वह मूर्ध- ज्योति है। इस मूर्धज्योति को परिपक्व बना लेने पर सिद्ध पुरुष = उच्च कोटि के योगियों को जानने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है। साधारण व्यक्ति जिन योगियों को नहीं जान सकता, उनको योगाभ्यासी जान लेता है।
यहाँ एक ध्यान देने योग्य बात है। भूमिस्थ सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है। भूमि और लोक के मध्य में चलने वाले ग्रहोपग्रहादि का दर्शन होता है। द्युलोक एवं पृथिवीलोक के मध्य में सिद्ध पुरुष घूमते हैं, ऐसा मन्तव्य परीक्षणीय है॥३२॥