Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 31

3/31
Sutra
कूर्मनाड्यां स्थैर्यं ।। ३.३१ ।।

Bhashya

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Word Meaning

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्॥३१॥

शब्दार्थ (कूर्म-नाड्याम्) कूर्म नामक नाडी में संयम करने से (स्थैर्यम्) स्थिरता आती है। 

सूत्रार्थ - कूर्म नाडी में संयम करने से शारीरिक और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। 

Vyas Bhashya

कूपादध उरसि कूर्माकारा नाडी। तस्यां कृतसंयमः स्थिरपदं लभते। यथा सर्पो गोधा चेति॥३१॥

व्या० भा० अ० - (कण्ठ) कूप से नीचे उरः स्थल में कूर्माकार की नाडी है। उसमें संयम करने से योगी 'स्थिरपद' को प्राप्त करता है। जिस प्रकार सर्प वा गोधा॥३१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में कूर्म नाड़ी में संयम करने का फल बतलाया है। कण्ठ कूप के नीचे उरः स्थल में कछुए के आकार की नाड़ी होती है। उसमें संयम करने से योगी स्थिरत्व को प्राप्त करता है। स्थिरत्व का अभिप्राय है कि योगी का शरीर और मन दोनों अच्छे प्रकार से दीर्घ काल पर्यन्त स्थिर रहते हैं। इसको जानने के लिए एक प्रसिद्ध दृष्टान्त दिया गया है। जैसे-गोह और सर्प अपने बिल में प्रवेश करने के पश्चात् इतने दृढ़ हो जाते हैं कि उनकी पूँछ पकड़कर कोई बाहर निकालना चाहे तो बहुत कठिनाई होती है॥३१॥

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