Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 29

3/29
Sutra
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानं ।। ३.२९ ।।

Bhashya

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Word Meaning

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्॥२९॥

शब्दार्थ - (नाभि-चक्रे) नाभि चक्र में संयम करने से (काय-व्यूह-ज्ञानम्) शरीर की रचना का ज्ञान होता है।

सूत्रार्थ - शरीर के नाभि चक्र में संयम करने से 'शरीर की रचना का ज्ञान' होता है। 

Vyas Bhashya

नाभिचक्रे संयमं कृत्वा कायव्यूहं विजानीयात्। वातपित्तश्लेष्माणस्त्रयो दोषाः। धातवः सप्त त्वग्लोहितमांसस्नाय्वस्थिमज्जाशुक्राणि। पूर्वं पूर्वमेषां बाह्यमित्येवष विन्यासः॥२९॥

व्या० भा० अ० - नाभि चक्र में संयम करके काया के अङ्गों के सन्निवेश को जाने। वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। त्वचा, रक्त, मांस, स्नायु, अस्थि, मज्जा, शुक्र ये सात धातु हैं। इनमें से त्वचा आदि पूर्व पूर्व बाह्य हैं। (त्वचा सबसे बाहर, उसके भीतर रक्त, उसके भीतर मांस, उसके भीतर स्नायु, उसके भीतर अस्थि, उसके भीतर मज्जा, उसके भीतर शुक्र है )॥२९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में नाभि चक्र में संयम करने का फल बतलाया है। नाभिचक्र में संयम करने से 'कायव्यूह' का ज्ञान होता है अर्थात् शरीर में स्थित वात, पित्त, कफ ये तीन दोष हैं और त्वचा, रक्त, मांस, स्नायु, अस्थि, मज्जा, वीर्य ये सात धातु हैं। इनमें पूर्व पूर्व धातु बाह्य है। वीर्य से बाहर मज्जा है। मज्जा से बाहर अस्थि-हड्डी है।अस्थि से बाहर स्नायु है। स्नायु से बाहर मांस है। मांस से बाहर रक्त है। रक्त से बाहर त्वचा है। इस प्रकार से शरीर में स्थित पदार्थों का विन्यास विशेष है स्थिति विशेष है। इन तीनों दोषों एवं सात धातुओं का अस्तित्व शरीर में है। परन्तु शरीरगत समस्त अङ्ग, धातु, उनका स्थान एवं उनकी रचना का पूर्णज्ञान नाभिचक्र में संयम करने से कैसे होता है, यह परीक्षणीय है॥२९॥

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