Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 27
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्॥२७॥
शब्दार्थ - (चन्द्रे) चन्द्रमा में संयम करने से (तारा-व्यूह-ज्ञानम्) तारों के संनिवेश का ज्ञान होता है।
सूत्रार्थ चन्द्रमा में संयम करने से कौन सा तारा किस स्थान में अवस्थित है, यह ज्ञान हो जाता है।
व्या० भा० - चन्द्रे संयमं कृत्वा ताराणां व्यूहं विजानीयात्॥२७॥
व्या० भा० अ० - चन्द्र में संयम करके तारों के संनिवेश विशेष को जाने॥२७॥
इस सूत्र में यह बतलाया है कि चन्द्रमा में संयम करने से योगी को तारों की स्थिति का ज्ञान होता है।
अनेक टीकाकारों ने सूत्र में पठित चन्द्र शब्द से इड़ा ( इळा) नाड़ी का ग्रहण किया है। परन्तु पूर्व सूत्र के व्याख्यान में हमारे बतलाये हेतु के अनुसार इस सूत्र में पठित चन्द्र शब्द से भौतिक चन्द्रमा का ग्रहण करना संगत है।
चन्द्रमा में संयम करने से चन्द्रमा का और उससे सम्बद्ध अन्य लोकों का सामान्यज्ञान हो जाता है। जैसे चन्द्र में संयम करने से योगी को तारों के व्यूहों का कुछ स्थूल ज्ञान होता है। चन्द्र प्रतिदिन भिन्न-भिन्न तारों के क्षेत्र में दिखता है कभी किसी तारे के अधिक निकट दिखता है तो कभी दूर। कभी किसी तारे के उत्तर में होता है तो कभी उसके दक्षिण में और कभी किसी तारे को ढकता हुआ दिखता है। कुछ तारों से सदा उत्तर में होता है, तो कभी कुछ के दक्षिण में होता है। परन्तु चन्द्रमा और चन्द्रमा से सम्बद्ध तारों का पूर्णरूपेण ज्ञान नहीं हो सकता है॥२७॥