Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 25

3/25
Sutra
प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानं ।। ३.२५ ।।

Bhashya

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Word Meaning

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्॥२५॥

शब्दार्थ - (प्रवृत्ति-आलोक-न्यासात्) प्रवृत्ति के प्रकाश को सूक्ष्म, व्यवहित और दूरस्थ वस्तुओं में लगाने से (सूक्ष्म-व्यवहित-विप्रकृष्ट-ज्ञानम्) सूक्ष्म, व्यवधानयुक्त तथा सुदूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।

सूत्रार्थ - मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक में संयम करके उस आलोक को सूक्ष्म, आवरणयुक्त तथा दूर वाली वस्तुओं में लगाने से उन सूक्ष्म आदि वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। 

Vyas Bhashya

ज्योतिष्मती प्रवृत्तिरुक्ता मनसः (१ /३६)। तस्यां य आलोकस्तं योगी सूक्ष्मे वा व्यवहिते वा विप्रकृष्टे वार्थे विन्यस्य तमर्थमधगच्छति॥२५॥

व्या० भा० अ० - मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति कही गई है (योगदर्शन १/३६)। उसमें जो प्रकाश है उसको (योगी) सूक्ष्म वा व्यवहित अथवा दूर के पदार्थ में डालकर उस पदार्थ को जान ता है।। २५।।

Yog Prakash

इस सूत्र में प्रवृत्ति के आलोक के प्रयोग से तीन सिद्धियाँ मानी हैं।योगदर्शन के प्रथम पाद के ३६ वें सूत्र में 'मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति' कही है। उसका जो प्रकाश है योगी उस प्रकाश को सूक्ष्म, व्यवहित और दूर के पदार्थों में डाल करके उन के स्वरूप को जान लेता है। सत्त्वगुण प्रकाशशील है और ज्योतिष्मती प्रवृत्ति भी सात्त्विक है। उसके माध्यम से जीवात्मा अपने स्वरूप को और अन्य अनेक सूक्ष्म विषयों को जानने में सफल हो जाता है। परन्तु परोक्ष पदार्थों को और अति दूर के पदार्थों को कैसे जानता है यह प्रयोगपूर्वक नहीं देखा गया।

सात्त्विक प्रवृत्ति से योगाभ्यासी अपनी चित्त की सूक्ष्म वृत्तियों को जानने में सफल हो जाता है। यह प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है। योगाभ्यास के समय योग के विरुद्ध वृत्तियों को जानकर उनको रोक देना और सात्त्विक वृत्तियों को ईश्वर प्राप्ति की ओर लगा देना, जो ज्योतिष्मती प्रवृत्ति से सिद्ध हो सकता है। ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के प्रकाश को डालकर योगी भूगर्भ में विद्यमान व्यवहित पदार्थों को और हजारों मील दूर के पदार्थों को कैसे जानता है, यह विचारणीय है।। २५।।

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