मैत्री करुणा मुदितेति तित्रो भावनाः। तत्र भूतेषु सुखितेषु मैत्रीं भावयित्वा मैत्रीबलं लभते। दुःखितेषु करुणां भावयित्वा करुणाबलं लभते। पुण्यशीलेषु मुदितां भावयित्वा मुदिताबलं लभते। भावनातः समाधिर्यः स संयमः, ततो बलान्यबन्ध्यवीर्याणि जायन्ते। पापशीलेषूपेक्षा न तु भावना। ततश्च तस्यां नास्ति समाधिरित्यतो न बलमुपेक्षातः, तत्र संयमाभावादिति॥२३॥
व्या० भा० अ० - मैत्री करुणा मुदिता ये तीन भावनाएँ हैं। इन तीनों में से (योगी) सुखी (प्राणियों) में मैत्री की भावना करके, मैत्रीबल को प्राप्त करता है। दुःखी (प्राणियों) में करुणा की भावना करके, करुणाबल को प्राप्त करता है। पुण्यात्माओं में मुदिता की भावना करके, मुदिता बल को प्राप्त करता है। भावना से जो समाधि (उत्पन्न) होती है, वह 'संयम' कहलाता है। उस (समाधिजन्य संयम) से अप्रतिहत सामर्थ्य वाले बल उत्पन्न होते हैं। पापियों में उपेक्षा की जाती है, भावना नहीं। इसलिये उसमें (धारणा, ध्यान) समाधि नहीं होती है इसलिए उपेक्षा से बल प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें संयम नहीं किया जाता है॥२३॥