इस सूत्र में अन्तर्धान सिद्धि का कथन है। जब योगी अपने शरीर के रूप में संयम करता है, तो रूप की ग्राह्यशक्ति रुक जाती है अर्थात् रूप में जो दिखने की शक्ति है, वह रुक जाती है। नेत्र इन्द्रिय के प्रकाश का रूप के साथ सम्बन्ध न होने से अन्तर्धान की सिद्धि होती है, अर्थात् योगी के शरीर का रूप दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार से व्यासभाष्य में शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध इन चार विषयों की भी शक्ति रोकने का कथन किया गया है। रूप, स्पर्श आदि शरीर के स्वाभाविक गुण हैं। इस अन्तर्धान सिद्धि के अनुसार योगी शरीर के रूप, स्पर्श आदि गुणों को संयम से रोक देवेगा, तो योगी का शरीर पत्थर, लोहा आदि से टकराना नहीं चाहिये और न योगी के शरीर से पत्थर आदि के टकराने पर उसकी मृत्यु होनी चाहिये। शरीर के रूप, स्पर्श आदि स्वाभाविक गुणों को स्तंभित कर देना सृष्टि नियम विरुद्ध होने के कारण, यह सिद्धि ठीक प्रतीत नहीं होती॥२१॥