Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 20

3/20
Sutra
न च तत्सालम्बनं, तस्याविषयीभूतत्वात् ।। ३.२० ।।

Bhashya

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Word Meaning

न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥२०॥

शब्दार्थ - (न च) और नहीं (तत्) उस परचित्त का ज्ञान (सालम्बनम्) आलम्बन सहित होता है (तस्य) परचित्त के आलम्बन का (अ-विषयीभूतत्वात्) योगी के संयम का विषय न होने से।

सूत्रार्थ दूसरे के चित्त में संयम करने से परचित्त का ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता है, क्योंकि परचित्त का जो आलम्बन है, वह योगी के संयम का विषय नहीं है। 

Vyas Bhashya

रक्तं प्रत्ययं जानात्यमुष्मिन्नालम्बने रक्तमिति न जानाति। परप्रत्ययस्य यदालम्बनं  तद्योगिचित्तेन नालम्बनीकृतम्। परप्रत्ययमात्रं तु योगिचित्तस्यालम्बनीभूतमिति॥२०॥

व्या० भा० अ० - रागयुक्त चित्त को जानता है, अमुक आलम्बन में अनुरक्त है, ऐसा नहीं जानता। अन्य पुरुष के चित्त का जो आलम्बन है, उसको योगी के चित्त के द्वारा आलम्बन नहीं बनाया गया। क्योंकि केवल दूसरे का प्रत्यय (चित्त) योगी के चित्त के द्वारा आलम्बन बनाया गया है॥२०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में पर व्यक्ति के चित्त के आलम्बन का ज्ञान होने का निषेध किया है। अन्य व्यक्ति के ज्ञान में संयम करने से योगी उसके चित्त में विद्यमान राग, द्वेष, प्रेम, परोपकार आदि भावों को तो जान लेता है। परन्तु उस व्यक्ति का किस पदार्थ, मनुष्य, पशु, पक्षी में राग, द्वेष, प्रेम है उनको योगी नहीं जानता। क्योंकि अन्य व्यक्ति का चित्त जिन पदार्थों के विषय में राग, द्वेष, प्रेम, जिज्ञासा आदि रखता है, वे पदार्थ योगी के संयम का विषय नहीं होते। इसलिये योगी जिन वस्तुओं को संयम का विषय बनाता है; उसको उन्हीं के विषय में ज्ञान होता है, अन्यों के विषय में नहीं॥२०॥

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