इस सूत्र में पर व्यक्ति के चित्त के आलम्बन का ज्ञान होने का निषेध किया है। अन्य व्यक्ति के ज्ञान में संयम करने से योगी उसके चित्त में विद्यमान राग, द्वेष, प्रेम, परोपकार आदि भावों को तो जान लेता है। परन्तु उस व्यक्ति का किस पदार्थ, मनुष्य, पशु, पक्षी में राग, द्वेष, प्रेम है उनको योगी नहीं जानता। क्योंकि अन्य व्यक्ति का चित्त जिन पदार्थों के विषय में राग, द्वेष, प्रेम, जिज्ञासा आदि रखता है, वे पदार्थ योगी के संयम का विषय नहीं होते। इसलिये योगी जिन वस्तुओं को संयम का विषय बनाता है; उसको उन्हीं के विषय में ज्ञान होता है, अन्यों के विषय में नहीं॥२०॥