Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 2

3/2
Sutra
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानं ।। ३.२ ।।

Bhashya

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Word Meaning

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥

शब्दार्थ - (तत्र) जिस स्थान में धारणा की हुई है उस स्थान में (प्रत्यय-एकतानता) ज्ञेय विषयक ज्ञान का एक समान बना रहना (ध्यानम्) ध्यान है।

सूत्रार्थ - जिस स्थान में धारणा की हुई है उसी स्थान में ज्ञेय-विषयक ज्ञान का एक समान बना रहना अर्थात् ज्ञेय विषयक ज्ञान से भिन्न ज्ञान को उपस्थित न करना 'ध्यान' है। 

Vyas Bhashya

तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्॥२॥

व्या० भा० अ० - उस (धारणा विषयक) प्रदेश में ध्येय रूपी आलम्बन वाले ज्ञान की एकरूपता (ज्ञान का) एक समान प्रवाह अर्थात् दूसरे ज्ञान से अमिश्रित ज्ञान प्रवाह 'ध्यान' कहलाता है।। २।

Yog Prakash

इस सूत्र में ध्यान का स्वरूप बतलाया गया है। योग जिज्ञासुओं को ध्यान के विषय में विशेष रूप से जानना चाहिये। ईश्वर का ध्यान करने वाले साधकों को प्रथम शब्द प्रमाण अथवा अनुमान प्रमाण से ईश्वर के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिये। यदि साधक ईश्वर के स्वरूप को ठीक प्रकार से नहीं जानते अथवा विपरीत जानते हैं तो ध्यान में सफलता नहीं मिलती। जैसे शब्द प्रमाण से यह जान लिया कि ईश्वर सर्व-व्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, आनन्दस्वरूप है। ध्यान करते समय भी इसी प्रकार से ईश्वर को वैसा ही जानकर उसका ध्यान करना चाहिये। जो वस्तु जैसी है उसको वैसी ही जानकर ध्यान करना चाहिये। ध्यान करते समय जिस पदार्थ का ध्यान किया जाता है उसको छोड़कर अन्य पदार्थ का स्मरण नहीं करना चाहिये। और न इन्द्रियों से किसी पदार्थ को देखने का प्रयत्न ही करना चाहिये। यदि ध्यान के मध्य में मन से ध्येय से भिन्न विषय को उठा लिया जाता है तो उसको रोक देना चाहिये। महर्षि कपिल जी ने ध्यान के विषय में कहा है कि -

"रागोपहतिर्ध्यानम् "॥सांख्य० ३/३०॥

राग का रुक जाना 'ध्यान' है। अर्थात् ईश्वर का ध्यान करते समय अन्य किसी भी विषय में राग का न होना 'ध्यान' है।

"ध्यानं निर्विषयं मनः" सांख्य० ६ / २५॥

योग के विषय से भिन्न विषय में मन का न जाना 'ध्यान' है। योगाभ्यासी रूपवान् पदार्थ के साक्षात्कार के लिए रूपवान् पदार्थ का ध्यान करता है। उस समय वह रूप के भोग के लिए रूपवान् का ध्यान न करे। यदि करता है तो वह निर्विषय नहीं, सविषय है। 'निर्विषय' का अर्थ यह भी है कि वह रूपवान् पदार्थ के साक्षात्कार के समय मन से रसवान् पदार्थ का विचार न करें। रूपवान् पदार्थ के साक्षात्कार के लिए रूपवान् विषय का ध्यान करना निर्विषय ही है। योग के अनुकूल ही है। इस लिए प्रथम - पदार्थ का स्वरूप शब्द प्रमाण वा अनुमान प्रमाण से अच्छे प्रकार से जानकर फिर जहाँ पर धारणा की गई है, वहीं पर ध्यान करना चाहिये। यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि कुछ भी न विचारने का नाम ध्यान नहीं है। ध्यानकाल में जिस पदार्थ का ध्यान किया जाता है वह पदार्थ और उसका नाम दोनों का ज्ञान साधक को होना चाहिये। जैसे ईश्वर का ध्यान करते समय उसका नाम ओम् है और वह नामी है अर्थात् ईश्वर वाच्य है और ओम् उसका वाचक (शब्द) है। ओम् का अर्थ सहित बार - बार जप करना और अन्य विषय में मन को न लगाना ध्यान है। इसलिये किसी भी विषय में कुछ भी न विचारना ध्यान नहीं है।। २।।

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