इस सूत्र में संस्कारों के साक्षात्कार करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है, यह बतलाया है। संस्कार दो प्रकार के हैं। एक जो कि स्मृति और क्लेशों के कारण वासनारूप हैं, दूसरे (संस्कार) कर्म फल के कारण हैं जो धर्माधर्मरूप हैं। ये दोनों प्रकार के संस्कार पूर्वजन्म के सञ्चित हैं। ये परिणाम, चेष्टा, निरोध आदि धर्मों के समान चित्त के 'अपरिदृष्ट धर्म' हैं। इनमें किया गया संयम, संस्कारों के साक्षात्कार करने में समर्थ है। इन संस्कारों का साक्षात्कार देशकाल और निमित्तों के अनुभव के बिना नहीं हो सकता। संस्कारों का साक्षात्कार होने पर योगी को पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है। इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने की है कि क्या पूर्वजन्म का ज्ञान प्रत्यक्षस्मृति के रूप में होता है अथवा परोक्षस्मृति के रूप में होता है।
प्रत्यक्षस्मृति - जैसे इसी जन्म में किसी व्यक्ति ने बीस वर्ष का अपना वृतान्त ज्यों का त्यों बतला दिया कि मेरा जन्म इतने वर्ष पूर्व, इस ग्राम वा नगर में इस घर में हुआ था। ये मेरे मातापिता, भाई-बहिन हैं आदि। उस व्यक्ति को अपने जन्मस्थान, माता - पिता आदि के विषय में ठीक प्रकार से स्मरण है और अपने जन्म स्थान पर जाकर, उसको दिखा सकता है। यह है प्रत्यक्षरूप से स्मृति।
परोक्ष रूप से स्मृति - जिसमें संस्कार के कारण स्मृति तो होती है, परन्तु उसमें यह ज्ञात नहीं होता कि ये संस्कार किस देश, काल और किन पदार्थों के माध्यम से उत्पन्न हुए हैं।
जिस स्मृति में देश, काल और मनुष्य आदि पदार्थों का ज्यों का त्यों स्मरण होता है, वह प्रत्यक्ष रूप से स्मृति है। और जिस स्मृति में देश, काल और मनुष्य आदि पदार्थों का कुछ भी परिज्ञान नहीं होता है, वह परोक्षरूप से स्मृति है। गौ का बछड़ा उत्पन्न होते ही मां के स्तनों कादूध पीने का प्रयास करता है, यह परोक्ष स्मृति है। उस बछड़े को यह ज्ञात है कि इन स्तनों में दूध है। यह पूर्वजन्म के संस्कारों से स्मृति उत्पन्न हुई है। परन्तु बछडे को यह ज्ञात नहीं है कि उसने किस देश में, किस काल में, किस प्रकार की गौ के स्तनों का दूध पिया था। इस स्मृति के विषय में पुनर्जन्म मानने वालों में प्रायः मतभेद नहीं है। परन्तु देश, काल और अन्य पदार्थों सहित स्मृति के विषय में मतभेद है। इस सूत्र में 'पूर्व जन्म का ज्ञान होता है' ऐसा माना है, परन्तु महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस बात को स्वीकार नहीं किया, इसलिए यह विषय और विचारणीय है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वचन इस प्रकार से हैं
"प्रश्न - जो अनेक (जन्म) हों तो पूर्वजन्म और मृत्यु की बातों का स्मरण क्यों नहीं ? उत्तर - जीव अल्पज्ञ है त्रिकालदर्शी नहीं, इसलिए स्मरण नहीं रहता। और जिस मन से स्मरण करता है, वह भी एक समय में दो ज्ञान नहीं कर सकता। भला पूर्वजन्म की बात दूर रहने दीजिये, इसी देह में जब गर्भ में जीव था, शरीर बना, पश्चात् जन्मा, पाँचवें वर्ष से पूर्व तक जो जो बातें हुई हैं उनका स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और जागृत वा स्वप्न में बहुत सा व्यवहार प्रत्यक्ष में करके जब सुषुप्ति अर्थात् गाढ निद्रा होती है तब जागृत आदि व्यवहार का स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और तुम से कोई पूछे कि बारह वर्ष के पूर्व तेरहवें वर्ष के पाँचवें महीने के नवमें दिन दश बजे पर पहली मिनट में तुम ने क्या किया था ? तुम्हारा मुख, हाथ, कान, नेत्र, शरीर किस ओर किस प्रकार का था ? और मन में क्या विचार था ? (तो कुछ भी न बता सकोगे ) जब इसी शरीर में ऐसा है, तो पूर्वजन्म की बातों के स्मरण में शङ्का करनी केवल लड़कपने की बात है। और जो स्मरण नहीं होता है इसी से जीव सुखी है, नहीं तो सब जन्मों के दुःखों को देख दुःखित होकर मर जाता। जो कोई पूर्व और पीछे जन्म के वर्तमान को जानना चाहे तो भी नहीं जान सकता। क्योंकि जीव का ज्ञान और स्वरूप अल्प है। यह बात ईश्वर के जानने योग्य है, जीव के नहीं।"- सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास इसी प्रकार ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने पुनर्जन्म के विषय में 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में लखा है "जब इसी जन्म के व्यवहारों को इसी शरीर में भूल जाते हैं, तो पूर्व शरीर के व्यवहारों का कब ज्ञान रह सकता है ? "॥१८॥