तत्र वाग्वर्णेष्वेवार्थवती। श्रोत्रं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम्। पदं पुनर्नादानुसंहारबुद्धिनिर्ग्राह्यमिति। वर्णा एकसमयासंभवित्वात्परस्परनिरनुग्रहात्मानः, ते पदमसंस्पृश्यानुपस्थाप्याविर्भूतास्तिरोभूताश्चेति प्रत्येकमपदस्वरूपा उच्यन्ते।
वर्णः पुनरेकैकः पदात्मा सर्वाभिधानशक्तिप्रचितः सहकारिवर्णान्तरप्रतियोगित्वाद्वैश्वरूप्यमिवाऽऽपन्नः पूर्वश्चोत्तरेणोत्तरश्च पूर्वेण विशेषेऽवस्थापित इत्येवं बहवो वर्णाः क्रमानुरोधिनोऽर्थसंकेतेनावच्छिन्ना इयन्त एते सर्वाभिधानशक्तिपरिवृता गकारौकारविसर्जनीयाः सास्नादिमन्तमर्थं द्योतयन्तीति।
तदेतेषामर्थसंकेतेनावच्छिन्नानामुपसंहृतध्वनिक्रमाणां य एको बुद्धिनिर्भासस्तत्पदं वाचकं वाच्यस्य संकेत्यते। तदेकं पदमेकबुद्धिविषयमेकप्रयत्नाक्षिप्तमभागमक्रममवर्णं बौद्धमन्त्यवर्णप्रत्ययव्यापारोपस्थापितं परत्र प्रतिपिपादयिषया वर्णैरेवाभिधीयमानैः श्रूयमाणैश्च श्रोतृभिरनादिवाग्व्यवहारवासनानुविद्धया लोकबुद्धया सिद्धवत्संप्रतिपत्त्या प्रतीयते। तस्य संकेतबुद्धितः प्रविभागः। एतावतामेवंजातीयकोऽनुसंहार एकस्यार्थस्य वाचक इति।
संकेतस्तु पदपदार्थयोरितरेतराध्यासरूपः स्मृत्यात्मको, योऽयं शब्दः सोऽयमर्थो योऽयमर्थः सोऽयं शब्द इति एवमितरेतराध्यासरूपः संकेतो भवतीति। एवमेते शब्दार्थप्रत्यया इतरेतराध्यासात्संकीर्णा गौरिति शब्दो गौरित्यर्थो गौरिति ज्ञानम्। य एषां प्रविभागज्ञः स सर्ववित्। सर्वपदेषु चास्ति वाक्यशक्तिः, वृक्ष इत्युक्तेऽस्तीति गम्यते। न सत्तां पदार्थो व्यभिचरतीति। तथा न ह्यसाधना क्रियाऽस्तीति। तथा च पचतीत्युक्ते सर्वकारकाणामाक्षेपः। नियमार्थोऽनुवादः कर्तृकरणकर्मणां चैत्राग्नितण्डुलानामिति। दृष्टं च वाक्यार्थे पदरचनं श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते जीवति प्राणान्धारयति। तत्र वाक्ये पदपदार्थाभिव्यक्तिस्ततः पदं प्रविभज्य व्याकरणीयं क्रियावाचकं वा कारकवाचकं वा। अन्यथा भवत्यश्वोऽजापय इत्येवमादिषु नामाख्यातसारूप्यादनिर्ज्ञातं कथं क्रियायां कारके वा व्याक्रियेतेति।
तेषां शब्दार्थप्रत्ययानां प्रविभागः। तद्यथा श्वेतते प्रासाद इति क्रियार्थः, श्वेतः प्रासाद इति कारकार्थः शब्दः। क्रियाकारकात्मा तदर्थः प्रत्ययश्च। कस्मात् ? सोऽयमित्यभिसंबन्धादेकाकार एव प्रत्ययः संकेत इति।
यस्तु श्वेतोऽर्थः स शब्दप्रत्यययोरालम्बनीभूतः। स हि स्वाभिरवस्थाभिर्विक्रियमाणो न शब्दसहगो न बुद्धिसहगतः। एवं शब्द एवं प्रत्ययो नेतरेतरसहगत इत्यन्यथा शब्दोऽन्यथार्थोऽन्यथा प्रत्यय इति विभागः। एवं तत्प्रविभागसंयमाद्योगिनः सर्वभूतरुतज्ञानं संपद्यत इति॥१७॥
व्या० भा० अ० - उन (शब्दार्थ प्रत्ययों) में से वाणी, वर्णों से उच्चारण में चरितार्थ होती है। श्रोत्रेन्द्रिय केवल ध्वनि के परिणाम को विषय करने वाला है। और पद नादानुसंहार बुद्धि के द्वारा ग्रहण करने योग्य होता है। वर्ण एक समय में (उच्चरित) होने वाले न होने से परस्पर असम्बद्ध (स्वरूप वाले) होते हैं। वे (वर्ण) पद को स्पर्श न करके (अर्थात् पदत्व को प्राप्त न करके) उपस्थापित न करके आविर्भूत और तिरोहित होते हैं। अतः प्रत्येक (वर्ण) पदस्वरूप नहीं होता है। (यह तो वर्णों एवं पदों का भेद कहा गया)।
(दूसरी दृष्टि से) प्रत्येक वर्ण पदस्वरूप, सब अर्थों को बतलाने की शक्ति से युक्त, सहकारी अन्य वर्णों से सम्बद्ध होने के कारण नाना-असङ्ख्य पदरूप को प्राप्त जैसा, पूर्व (वर्ण) उत्तर (वर्ण) से और उत्तर (वर्ण) पूर्व (वर्ण) से विशेषरूप से अवस्थापित होता है। इस प्रकार बहुत वर्ण, क्रम की अपेक्षा रखने वाले अर्थ, सङ्केत से युक्त इतने (ये एक, दो, तीन, चार आदि) वर्ण समस्त अर्थों को बतलाने की शक्ति से युक्त, गकार-औकार-विसर्जनीय सास्नादियुक्त (गौः) पदार्थ को प्रकाशित करते हैं।
अर्थ सङ्केत से युक्त ध्वनिगत क्रम से रहित, उन इन (वर्णों) की जो एक अभिव्यक्ति बुद्धि में होती है; वह वाच्य (अर्थ) का वाचक संकेतित होता है, वह पद कहाता है। वह पद एक होता है (क्योंकि) एक बुद्धि का विषय है, एक (ध्वनिरूप) प्रयत्न से सम्पादित होता है, अखण्ड एवं क्रमरहित होता है वर्णों से भिन्न (= रहित) होता है। (वह) बुद्धिनिष्ठ होता है, अन्तिम वर्ण के ज्ञान के व्यापार से अभिव्यक्त होता है। ( वह पद) दूसरों को बताने की इच्छा से, (वक्ता के द्वारा) कहे जाने वाले श्रोताओं के द्वारा सुने जाने वाले वर्णों के द्वारा (परम्परा से), अनादि काल से वाग्व्यवहार की वासना से वासित, लोकबुद्धि के द्वारा नित्य के समान सम्यक् ज्ञान द्वारा प्रतीत होता है। उसका सङ्केतबुद्धि के द्वारा विभाग होता है कि इतने वर्णों का इस प्रकार का मिलन एक अर्थ का वाचक है।
संकेत तो पद एवं पदों के अर्थों का इतरेतराध्यासरूप स्मृतिरूप होता है, जैसे कि जो यह शब्द है वह अर्थ है, जो यह अर्थ है वह शब्द है। इस प्रकार संकेत परस्पर अध्यासरूप होताहै। इस प्रकार ये शब्दार्थप्रत्यय परस्पर अध्यास के द्वारा मिश्रित है। उदाहरण:- गौ शब्द है, गौ (ही) अर्थ है, गौ (ही) ज्ञान है। जो इनके विभागों को जानने वाला है, वह सर्ववित् है। सब पदों में (अन्य पदों के साथ मिलकर) वाक्यशक्ति (अर्थबोधकशक्ति) है ( क्योंकि एक वर्ण सर्वाभिधानशक्तियुक्त होता है)। 'वृक्ष' ऐसा कहने पर 'है' ऐसा ज्ञात होता है। (क्योंकि) पदार्थ सत्ता को छोड़कर नहीं रहता और इसी प्रकार कारकरहित क्रिया नहीं होती है।
और इसी प्रकार 'पचति' ऐसा कहने पर सब कारक उपस्थित होते हैं। कर्त्ता, करण, कर्मात्मक। चैत्र, अग्नि, तण्डुल, का अनुवाद नियम के लिये (कि अन्य कारक न लिए जायें) है। वाक्य के अर्थ में पद की रचना देखी गई है। 'छन्द का अध्ययन करता है' इस (वाक्य) के लिए 'श्रोत्रिय' पद की, 'प्राणों को धारण करता है' इस (वाक्य) के लिए जीवति पद की रचना देखी गई है। (पद एवं वाक्य के विषय में) पदों के अर्थों की अभिव्यक्ति वाक्य में होती है। उस से पद का विभाग करके व्याख्यान करना चाहिए कि (वह पद) क्रिया को कहता है वा कारक को। नहीं तो भवति, अश्व, अजापय इत्यादियों में नाम और आख्यातों के रूप समान होने के कारण ज्ञात नहीं होता कि (इनका) क्रिया में व्याख्यान करना चाहिए वा कारक में।
उन शब्दार्थ प्रत्ययों का प्रविभाग होता है। उदाहरण:- श्वेतते प्रासादः (प्रासाद श्वेत होता है) इस वाक्य में स्थित (श्वेतते) क्रियार्थ है। श्वेतः प्रासादः (प्रासाद श्वेत है) यहाँ श्वेत शब्द कारकार्थक है। इन (श्वेतते, श्वेत) पदों में क्रमशः क्रियार्थ और कारकार्थ और ज्ञान भी क्रिया एवं कारक रूप में होता है। क्यों ? (शब्दार्थ ज्ञानों में भेद करना चाहिए?) वह यह है इस प्रकार (इतरेतर अध्यास के कारण) एकाकार ही ज्ञानात्मक संकेत होता है।
जो श्वेत अर्थ (पदार्थ) है वह शब्द और ज्ञान का आलम्बन बना है। वह (अर्थ) ही अपनी अवस्थाओं के द्वारा विकारों को प्राप्त हुआ न शब्द के साथ (सङ्कीर्ण) है न बुद्धि के साथ (सङ्कीर्ण) है। इस प्रकार शब्द है, इस प्रकार ज्ञान है, परस्पर सङ्कीर्ण है। इस प्रकार शब्द अन्य प्रकार का है, अर्थ अन्य प्रकार का है, ज्ञान अन्य प्रकार का है इस प्रकार विभाग है। इस प्रकार उनके विभागों में संयम करने से योगी को सब प्राणियों के शब्दों का ज्ञान हो जाता है।। १७।
विशेष - शब्दगत वर्ण एक साथ उच्चरित नहीं होते हैं। क्रमशः उच्चरित होते हैं। अर्थ तो शब्दगत एक-एक अक्षर का नहीं होता है। अक्षरों से अतिरिक्त और कोई समुदाय नहीं जिससे अर्थ की प्रतिपत्ति हो। एक काल में एक अक्षर ही रहता है। 'गौ: ' शब्द में जब गकार उच्चरित होता है; तब औकार विसर्जनीय नहीं, जब औकार उच्चरित होता है; तब गकार विसर्जनीय नहीं, जब विसर्जनीय होता है; तब गकार औकार नहीं। इसलिये गकारादि से अतिरिक्त कोई अन्य गौ शब्द है जिससे अर्थ की प्रतिपत्ति होती है, इस आधार पर कई आचार्यों ने स्फोट की कल्पना की है, शब्द को नित्य मानने वाले वैयाकरणों ने भी इसको स्वीकार किया है। परन्तु मीमांसा भाष्यकार शब्द को नित्य मानने वाले शबर स्वामी ने स्फोट को स्वीकार नहीं किया। इसकी विवेचना
करते हुए श्री पण्डित युधिष्ठिर जी मीमांसक ने लिखा है कि 'वस्तुतः स्फोटपदार्थः काल्पनिक एव तस्यागृह्यमाणत्वात्।' वास्तव में स्फोट पदार्थ काल्पनिक ही है क्योंकि वह गृहीत नहीं होता है। शब्दार्थ का सम्बन्ध सामयिक है नित्य नहीं है। अतः तात्त्विक दृष्टि से स्फोट की सिद्धि नहीं होती।