धर्मलक्षणावस्थापरिणामेषु संयमाद्योगिनां भवत्यतीतानागतज्ञानम्। धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयम उक्तः (३।४)। तेन परिणामत्रयं साक्षात्क्रियमाणमतीतानागतज्ञानं तेषु संपादयति॥१६॥
व्या० भा० अ० - धर्म लक्षण अवस्था परिणामों में संयम से योगियों को अतीत, अनागत ज्ञान होता है। एक विषयक धारणाध्यानसमाधित्रय को 'संयम' कहा है। संयम के द्वारा साक्षात्कृत परिणामत्रय उनमें अनुगत (ध्येय) पदार्थों के अतीत, अनागत ज्ञान को सम्पादित करता है॥१६॥
विशेष – योगदर्शन के तीसरे पाद के १६वें सूत्र से विभूतियों का विषय प्रारम्भ होता है। विभूतियों के विषय में अनेक मतभेद हैं। किसी भी विषय में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परीक्षा करके सत्य और असत्य का निर्णय करना आवश्यक है। महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने सत्य और असत्य की परीक्षा करने के लिये पाँच आधार माने हैं।
(१) जो जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और वेदों से अनुकूल हो, वह वह 'सत्य' उससे विरुद्ध असत्य है।
(२) जो जो सृष्टिक्रम से अनुकूल वह वह सत्य और जो जो सृष्टिक्रम से विरुद्ध है वह वह असत्य है।
(३) 'आप्त' अर्थात् जो धार्मिक, विद्वान् सत्यवादी निष्कपटियों का संग उपदेश के अनुकूल हो वह वह ग्राह्य और जो जो विरुद्ध वह वह अग्राह्य है।
(४) अपने आत्मा की पवित्रता विद्या के अनुकूल अर्थात् जैसा अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है, वैसे ही सर्वत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को दुःख, सुख दूँगा तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा।
(५) आठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव। सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास –
इन्हीं पाँच कसौटियों के द्वारा योग के नाम से प्रचलित विभूतियों के विषय में सत्य और असत्य को जानने और जनाने का प्रयास किया जायेगा। यदि सत्य और असत्य के निर्णय में त्रुटि हो गई हो तो प्रमाणों से सिद्ध होने पर उसको स्वीकार किया जायेगा