इस सूत्र में क्रमान्यत्व को परिणाम के अन्यत्व में हेतु बतलाया है।एक धर्मी का एक ही परिणाम होना चाहिये। क्योंकि एक का एक परिणाम होना ही उचित प्रतीत होता है। परन्तु क्रम भिन्न भिन्न होने से परिणाम भिन्न भिन्न होते हैं। जैसे चूर्ण मिट्टी, पिण्ड मिट्टी, घट मिट्टी, कपाल (= ठीकरा ) मिट्टी, कण मिट्टी यह क्रम है। जो एक धर्म के अनन्तर धर्म है, वह उसका 'क्रम' है। चूर्ण मिट्टी में पानी डालने से पिण्ड बन जाता है। उस पिण्ड का घड़ा बना दिया जाता है तो पिण्ड का आकार समाप्त हो जाता है और घटाकार उत्पन्न हो जाता है। यह मिट्टी धर्मी का 'धर्म परिणाम' है। घट का अनागत स्थिति से वर्तमान स्थिति को प्राप्त होना घट का ‘लक्षण परिणाम' है। जब घड़ा चूर्ण होकर नष्ट हो जाता है तब कोई क्रम नहीं रहता। क्योंकि पूर्वपरता में समनन्तरता होती है। जिस घट में परिणामादि क्रम होते हैं वह ही नहीं रहा तो क्रम भी नहीं हो सकता। अतीत का क्रम नहीं है। दो ही लक्षणों का क्रम होता है। नवीन घड़े का निर्माण करने के पश्चात् उसमें धीरे धीरे पुरानापन आता है। घड़ा जीर्ण-शीर्ण हो जाता है यह अवस्था परिणाम है। यद्यपि यह नये से पुराना कैसे हो गया प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं जाना जाता। किन्तु अनुमान प्रमाण से जाना जाता है। इसी प्रकार से अन्य पदार्थों में भी अवस्था परिणाम जान लेना चाहिये।
प्रायः व्यक्ति यह नहीं जानता है कि मेरा शरीर क्षण क्षण में पुराना हो रहा है और धीरे धीरे इसका विनाश हो जायेगा। यदि व्यक्ति इस बात को जान लेवे तो विवेक वैराग्य उत्पन्न हो सकता है और उससे समाधि भी प्राप्त हो सकती है। ये क्रम धर्म, धर्मी के अन्दर भेद मानने से होते हैं। धर्म भी धर्मी होता है, अन्य धर्म की अपेक्षा से। जैसे महत्तत्त्व प्रकृति की अपेक्षा से धर्म है। परन्तु अहंकार उसका कार्य होने से महत्तत्त्व धर्मी भी है। इसी प्रकार से अहंकार महत्तत्त्व की अपेक्षा से धर्म है और तन्मात्राओं का कारण होने से धर्मी है। ऐसे ही तन्मात्रायें पृथ्वी आदि का कारण हैं और पृथ्वी आदि कार्य है। पृथ्वी तन्मात्राओं का कार्य है और घड़े का कारण है। इसलिये अपेक्षा से यदि धर्म धर्मी में भेद न माना जाय तो क्रम भी नहीं बनेगा। धर्म धर्मी में भेद मानकर क्रम माना जाता है।
चित्त के दो प्रकार के धर्म हैं। एक दृष्ट जो प्रत्यक्ष प्रमाण से जाने जाते हैं और दूसरे अदृष्ट - जो अनुमान अथवा शब्द प्रमाण से जाने जाते हैं। जैसे राग-द्वेषादि चित्त के 'दृष्ट धर्म' हैं वैसे ही निरोध, धर्म, संस्कार, परिणाम, जीवन, चेष्टा, शक्ति ये चित्त के 'अदृष्ट (अपरिदृष्ट) धर्म' हैं। इन्हें इस प्रकार समझ सकते हैं -
(१) असंप्रज्ञात समाधि में चित्त में व्युत्थान संस्कारों का दब जाना और निरोध संस्कारों का प्रकट होना, यह चित्त का निरोध परिणाम है।
(२) मन, वाणी और शरीर के द्वारा जो कर्म किये जाते हैं, वे धर्माधर्म के रूप में चित्त में संचित होते हैं।
(३) संस्कार, स्मृतियों और रागादि क्लेशों को उत्पन्न करने वाली, चित्त में विद्यमान वासनायें 'संस्कार' कहलाती है।
(४) सत्त्वादि गुणों में निरन्तर क्रिया होने से चित्त में सतत परिवर्तन होता रहता है, इसे परिणाम कहते हैं।
(५) शरीर को जीवित रखने के लिए चित्त के द्वारा होने वाला प्रयत्न जीवन है।
(६) इन्द्रियों को अपने अपने कार्यों में प्रवृत्त करने के लिए चित्त जो क्रिया करता है, उसे चेष्टा कहते हैं।
(७) चित्त में अपने कार्यों को सम्पादित करने का जो सामर्थ्य है, उसे शक्ति कहते हैं। उपर्युक्त सातों धर्म चित्त के 'अपरिदृष्ट धर्म' माने जाते हैं॥१५॥