योग्यतावच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः। स च फलप्रसवभेदानुमितसद्भाव एकस्यान्योऽन्यश्च परिदृष्टः। तत्र वर्तमानः स्वव्यापारमनुभवन्धर्मो धर्मान्तरेभ्यः शान्तेभ्यश्चाव्यपदेश्येभ्यश्च भिद्यते। यदा तु सामान्येन समन्वागतो भवति तदा धर्मिस्वरूपमात्रत्वात्को ऽसौ केन भिद्यते।
तत्र ये खलु धर्मिणो धर्माः शान्ता उदिता अव्यपदेश्याश्चेति, तत्र शान्ता ये कृत्वा व्यापारानुपरताः। सव्यापारा उदिताः, ते चानागतस्य लक्षणस्य समनन्तराः। वर्तमानस्यानन्तरा अतीताः। किमर्थमतीतस्यानन्तरा न भवन्ति वर्तमानाः ? पूर्वपश्चिमताया अभावात्। यथानागतवर्तमानयोः पूर्वपश्चिमता, नैवमतीतस्य। तस्मान्नातीतस्यास्ति समनन्तरः। तदनागत एव समनन्तरो भवति वर्तमानस्येति।
अथाव्यपदेश्याः के ? सर्वं सर्वात्मकमिति। यत्रोक्तम् - जलभूम्योः पारिणामिकं रसादिवैश्वस्त्र्यं स्थावरेषु दृष्टम्, तथा स्थावराणां जङ्गमेषु जङ्गमानां स्थावरेष्वित्येवं जात्यनुच्छेदेन सर्वं सर्वात्मकमिति।
देशकालाकारनिमित्तापबन्धान्न खलु समानकालमात्मनामभिव्यक्तिरिति। य एतेष्वभिव्यक्तानभिव्यक्तेषु धर्मेष्वनुपाती सामान्यविशेषात्मा सोऽन्वयी धर्मी। यस्य तु धर्ममात्रमेवेदं निरन्वयं तस्य भोगाभावः। कस्मात् ? अन्येन विज्ञानेन कृतस्य कर्मणोऽन्यत्कथं भोक्तृत्वेनाधिक्रियेत। तत्स्मृत्यभावश्च, नान्यदृष्टस्य स्मरणमन्यस्यास्तीति। वस्तुप्रत्यभिज्ञानाच्च स्थितोऽन्वयी धर्मी यो धर्मान्यथात्वमभ्युपगतः प्रत्यभिज्ञायते। तस्मान्नेदं धर्ममात्रं निरन्वयमिति॥१४॥
व्या० भा० अ० - योग्यता से विशिष्ट धर्मी का सामर्थ्य ही 'धर्म' है। और वह (धर्म) भिन्न भिन्न प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति के भेद से अनुमित सत्ता वाला एक (धर्मी) का अन्य-अन्य देखा गया है। उनमें से वर्तमान धर्म अपने व्यापार को अनुभव करता हुआ शान्त (भूत) और अव्यपदेश्य (अनागत) धर्मों से भिन्न होता है। जब सामान्य (अनभिव्यक्तता) से (धर्मी में) रहता है तब केवल धर्मी स्वरूप होने से कौन किससे भिन्न होगा ?
उनमें से धर्मों के धर्म तीन हैं शान्त, उदित और अव्यपदेश्य। उनमें से जो (स्व) व्यापार को (सम्पादित) करके उपरत हैं, वे 'शान्त' हैं। जो व्यापारयुक्त हैं, वे 'उदित' हैं। और वे अनागत लक्षण के अव्यवहित हैं। वर्तमान के अव्यवहित अतीत होते हैं। वर्तमान, अतीत के अव्यवहित क्यों नहीं होते ? पूर्व-पश्चिमता का अभाव होने से। जिस प्रकार अनागत वर्तमानों की पूर्व पश्चिमता होती है इस प्रकार अतीत की (अनन्तरता) नहीं है। इसलिए अतीत का समानन्तर नहीं है। इसलिए अनागत ही वर्तमान का अव्यवहित पूर्ववर्ती होता है।
आगे 'अव्यपदेश्य' कौन है ? सभी पदार्थ सर्व कार्योत्पादन शक्ति से सम्पन्न होते हैं। जैसा कि कहा है जलभूमि का परिणाम रसादि सर्वात्मक (स्वरूप) स्थावरों में देखा गया है। उसी प्रकार स्थावरों का जङ्गमों में, जङ्गमों का स्थावरों में, इस प्रकार (जलत्वपृथिवीत्वादि) जाति का उच्छेद न होने से सभी पदार्थ सब रूपों वाले होते हैं।
देश, काल, आकार, निमित्त ( आत्मक सहकारी) कारणों के सम्बन्ध के अभाव से एक काल में सब पदार्थों की अभिव्यक्ति नहीं होती है। जो इन अभिव्यक्त अनभिव्यक्त 'धर्मों' में अनुगत सामान्य (धर्मी) विशेष (धर्म) (यह उभयरूप) अन्वयी (मृत्तिका आदि) है, वह धर्मी होता है। जिसके मत में यह चित्त केवल धर्ममात्र है। अनेकों में अनुगमन करने वाले अन्वयी नहीं हैं उसके (मत में) भोग का अभाव होता है। क्यों ? अन्य विज्ञान के द्वारा किये कर्म का अन्य (विज्ञान) भोक्ता के रूप में कैसे अधिकृत होगा ? अन्य के देखे का अन्य को स्मरण नहीं होता, इस आधार पर पूर्वानुभूतों का स्मृत्यभाव होगा। वस्तु के प्रत्यभिज्ञान होने तथा (सब में) अनुगमन करने वाला धर्मी है, जो धर्म रूप से अन्यथाभाव को प्राप्त होता हुआ प्रत्यक्ष का विषय बनता है। इसलिए यह अनुगमन (धर्मी रहित) धर्ममात्र नहीं है॥१४॥