इस सूत्र में चित्त का एकाग्रता परिणाम बतलाया है। एकाग्र चित्त का पूर्वज्ञान अर्थात् एकाग्रता की स्थिति में जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह शान्त होता जाता है और उसी के सदृश अन्य - अन्य ज्ञान उत्पन्न होता जाता है। जब तक समाधि भंग नहीं होती, तब तक यह स्थिति बनी रहती है। यह धर्मी चित्त का एकाग्रता परिणाम है। इन दोनों धर्मों में चित्त अनुगत रहता है। उदित ज्ञान और शान्त ज्ञान चित्त के धर्म हैं तथा चित्त इनका धर्मी है। जब जीवात्मा चित्त को अनेक विषयों में चलाता है, तब वह अनेक विषयों के चित्र उतार लेता है और जब अधिकारपूर्वक एक विषय में चित्त को स्थिर करता है तब एक पदार्थ का चित्र उतार लेता है। एकाग्रता की अवस्था में जो पदार्थ के स्वरूप का परिज्ञान होता है, वह दीर्घकाल पर्यन्त सदृश रूप में रहता है। चित्त के द्वारा आत्मा, पदार्थ के स्वरूप का अनुभव करता है, चित्त नहीं। जैसे नेत्र के द्वारा प्रत्यक्ष किये पदार्थ के स्वरूप का अनुभव आत्मा करता है, नेत्र नहीं। इसी प्रकार से चित्त की एकाग्रतावस्था में भी जानना चाहिये। चित्त में जो विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उनको 'परिणाम' कहते हैं। निरोध परिणाम, समाधि परिणाम और एकाग्रता परिणाम ये चित्त के तीन परिणाम बतलाये हैं। यदि क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त इन तीन अवस्थाओं का व्युत्थान परिणाम मान लिया जाये तो चित्त के चार परिणाम हो जायेंगे॥१२॥